Saturday, June 12, 2021

मेरे बचपन की यादें - भाग - 2

 आज मेरे बचपन की अर्थात जब मेरी आयु आठ-दस वर्ष से कम थी, तब की दो बातें बताता हूँ।

हमारे मोहल्ले में तो सबके घर साधारण से थे। किसी के घर डोरबेल वगैरह नहीं थी, लेकिन हमारे मोहल्ले के आस-पास की कॉलोनी में कई नौकरीपेशा लोग रहते थे। उन सबके घर पर डोरबेल लगी हुई थी।

मैं अक्सर हमारे आस-पड़ोस के मेरी उम्र वाले लड़के-लड़कियों को लेकर दोपहर के समय उनके घर की ओर जाता था और उनके घर की डोरबेल बजाते थे।

मेरे डोरबेल बजाते ही अन्य सभी लड़के-लड़कियाँ भाग जाते थे, लेकिन मैं वहीं आस-पास बैठ जाता था या खड़ा रहता था। मेरे चेहरे के हाव-भाव और मेरी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती थी, जैसे मैंने तो कुछ किया ही नहीं। मुझे खुद इस तरह डोरबेल बजाकर लोगों को परेशान करना बुरा लग रहा है।

जब घर से आन्टी या भैया-दीदी बाहर आकर मुझे देखते थे, तो मेरी ऐसी मासूमियत भरी बॉडी लैंग्वेज देखकर मुझसे ही पूछते थे कि घंटी किसने बजाई ?

मैं मासूमियत से बता देता था कि वो इधर से चार-पाँच लड़के-लड़कियाँ आए थे। वो चार-पाँच लड़के-लड़कियाँ उधर भाग गये।

मेरी बात सुनकर आन्टी, भैया, दीदी जो भी होते थे, वो बच्चों को बिगड़ैल, आवारा वगैरह बोलकर वापस अन्दर चले जाते थे।

हालाँकि कुछ समय बाद उन सबको पता चल गया कि सभी बच्चों को घेर-घारकर लाता तो यहीं है, लेकिन सबको पता चलने के बाद मैंने डोरबेल बजाना ही छोड़ दिया।

इसी तरह स्कूल में भी पहली क्लास से ही मेरी मासूम और भोली-भाली छवि बनी हुई थी।

मैं अक्सर दूसरे बच्चों को परेशान करता था और जो बच्चे मेरे सामने ज्यादा होशियारी दिखाते थे, उनको पीट भी देता था, लेकिन जब टीचर को मेरी शिकायत करने जाते, तो मैं खुद ही रोने लग जाता था।

इस तरह पहली क्लास से पाँचवी क्लास तक जब भी किसी बच्चे ने टीचर से मेरी शिकायत की, टीचर का हर बार यहीं जवाब होता था कि इसको दो साल हो गये इस स्कूल में। आज तक कभी इसकी कोई शिकायत नहीं आई कि इसने किसी को परेशान किया है, किसी को गाली दी है या किसी को मारा-पीटा है ?

इसमें मैडम के डायलॉग में प्रतिवर्ष केवल साल बढ़ जाता था, जैसे कि इसको तीन साल हो गये इस स्कूल में। इसको चार साल हो गये इस स्कूल में। बाकी डायलॉग पाँचवी तक सेम ही रहा था।

इससे आप यह समझ सकते हैं कि हमारे चेहरे के हाव-भाव और हमारी बॉडी लैंग्वेज अर्थात हमारे एक्सप्रेशन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। मैं थोड़ा-थोड़ा टाइम लगभग आधे भारत के कई शहरों और गाँवों में रह चुका हूँ। सभी जगह पर मुझसे मिलने वालों लोगों को लगा कि मैं वहीं का ही हूँ। यहाँ तक कि साउथ इंडिया में भी लोग यहीं समझते थे कि मैं साउथ इंडियन ही हूँ, बस मुझे साउथ इंडियन भाषा नहीं आती।

इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप अन्जान लोगों को लूटने वालों की लिस्ट से बाहर हो जाते हैं। क्योंकि ये लूटने वाले मोस्टली बाहर से आए हुए अन्जान लोगों को ही अपना शिकार बनाते हैं। हालांकि दिल्ली में ये सारे समीकरण फैल हो जाते हैं। क्योंकि दिल्ली में ही पले-बढ़े मेरे कई मित्र कई बार इनका शिकार बन चुके हैं।

एक-दो बार शिकार बनना सामान्य बात है, लेकिन चार-पाँच बार या आठ-दस बार शिकार बन रहे हैं ? इसका मतलब दिल्ली का कुछ अलग ही गणित है, जो दिल्ली में पले-बढ़े लोगों को समझ से भी बाहर है।

खैर, खुद को इस तरह वातानुकूलित बनाने के लिए सबको अपना समझना आवश्यक है। अगर हम हर गाँव को, हर शहर को, हर देश को अपना समझेंगे, तो कोई भी यह नहीं कह सकता कि हम बाहर से आए है। सबको यहीं लगेगा कि हम वहीं कहीं आस-पास के ही है, बस हमें भाषा नहीं आती, हमारा पहनावा और खान-पान अलग है।
..............................#Varman_Garhwal
07-06-2021, #वर्मन_गढ़वाल
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Wednesday, June 9, 2021

मेरे बचपन की यादें - भाग -1

 सभी मित्रों और सखियों को सप्रेम नमस्कार,

आप सभी का "मेरे बचपन की यादें" प्रोग्राम(वैसे ये यूट्यूब या टीवी का प्रोग्राम तो नहीं है, लेकिन फिर भी आप लोग imagine कर लेना।) में तहे दिल से स्वागत है।

आज मैं आपको "स्टापू" के बारे में बताऊँगा। मैंने पिछले 15-16 वर्ष से किसी को स्टापू खेलते हुए नहीं देखा, इसलिए मुझे मालूम नहीं है कि अभी के बच्चे स्टापू खेलते हैं या नहीं खेलते हैं ? लेकिन मेरे बचपन में हमारे आस-पड़ोस की लड़कियाँ सबसे अधिक स्टापू ही खेलती थी।

स्टापू को स्टेपू भी कहते है। हमारे यहाँ इसे स्टेपू ही कहते थे। स्टेपू मिट्टी के टूटे हुए घड़े का छोटा-सा चकोर या गोल टुकड़ा होता है। बड़ी उम्र की लड़कियाँ इसे मार्बल के टुकड़े से भी बना लेती थी।

स्टेपू खेलने के लिए जमीन पर 6 या 8 आयताकार या वर्गाकार डिब्बे बनाने होते हैं और स्टेपू उन डिब्बों में लगड़ी टाँग से कूद-कूदकर 4-5 अलग-अलग तरीके से खेला जाता है। स्टेपू मुख्य रूप से लड़कियों का अर्थात कन्याओं का खेल है। वैसे हमारे यहाँ छोटे लड़के अर्थात बालक भी कभी आपस में बालक-बालक और कभी कन्याओं के साथ स्टेपू खेलते थे। 

स्टेपू खेलने के सभी तरीके पूरी तरह मुझे याद नहीं है। मुझे केवल इतना याद है कि स्टेपू में स्टेज होती थी, जिसे एक-एक करके पार करना होता था। पहले एक खाने में स्टेपू फेंको, फिर लगड़ी टाँग कूद-कूदकर अंतिम खाने तक जाओ और वापस आकर पहली स्टेज पार करके अगली बार स्टेपू दूसरे खाने में फेंककर यहीं प्रकिया दोहरानी होती थी।

स्टेपू की सारी स्टेज पार करने के बाद अंत में किसी एक खाने पर अधिकार करना होता था। जिस खाने पर अधिकार होता था, उस खाने पर अधिकार करने वाली कन्या उस खाने में दोनों पैर रख सकती थी और प्रतिद्वंद्वी कन्या को वो खाना कूदकर जाना पड़ता था।

इसमें एक नियम यह भी था कि खाने पर अधिकार करने वाली कन्या अपनी प्रतिद्वंद्वी कन्या से पूछती थी कि डायी अर्थात बारी या टर्न(like it's my turn, it's my turn आप समझ गये होंगे कि डायी या बारी का अर्थ क्या है ?) चाहिए या रास्ता ?

अगर प्रतिद्वंद्वी कन्या डायी माँगती थी, तो उसे खाना(डिब्बा। भोजन मत समझ लेना) कूदकर जाना पड़ता था और अगर प्रतिद्वंद्वी कन्या रास्ता माँगती थी, तो खाने पर अधिकार करने वाली कन्या खाने में लकीर खींचकर खाने की थोड़ी-सी जगह पैर रखने के लिए दे देती थी और पुनः पहली स्टेज से शुरू करती थी।

इस स्टेपू खेल में खानों को अलग-अलग क्षेत्र या राज्य मान लीजिए और खेलने वाली कन्याओं और खेलने वाले बालकों को प्रतिद्वंद्वी योद्धा मान लीजिए। इस तरह सबसे अधिक खानों पर अर्थात सबसे अधिक क्षेत्रों पर अधिकार करने वाली कन्या विजयी होकर पराजित होने वाली प्रतिद्वंद्वी कन्या को सज़ा देती थी।

इसके अतिरिक्त स्टेपू के कुछ और भी नियम-कायदे थे, तो वो मुझे याद नहीं है। मैं तो इस खेल का नाम भी भूल गया था। इस खेल का नाम मैंने Neeraj Puri माता जी से पूछा। अब इस खेल से जुड़ा मेरे बचपन का एक किस्सा बताता हूँ।

90 के दशक में टीवी पर केवल दूरदर्शन चलता था और दूरदर्शन भी सुबह 11 बजे से शाम के 4 बजे तक बंद रहता था। 1997-98 से पहले दूरदर्शन केवल रविवार को पूरा दिन चलता था। इसके अलावा मोबाइल उस समय आए ही नहीं थे, इसलिए उस समय हमारे मोहल्ले की महिलाएँ घर के काम निपटाकर दोपहर के समय बाहर आकर गर्मियों में पेड़ों की छाँव में बैठकर और सर्दियों में धूप में बैठकर स्वेटर बुनने या इस टाइप के अपने-अपने काम करती हुई आपस में अपने-अपने बचपन की, अपने-अपने रिश्तेदारों की, अपने-अपने घर की परेशानियों इत्यादि पर बातचीत करके टाइमपास किया करती थी और महिलाओं के आस-पास या महिलाओं से थोड़ी दूर बच्चे खेलते रहते थे।

इसी तरह जब मेरी आयु 3-4 वर्ष की थी, तब दोपहर के समय मेरी मम्मी भी मुझे लेकर बाहर आकर बच्चों को बोल देती थी कि इसको भी अपने साथ खिलाओ या मुझे बोल देती थी कि जाओ, बच्चों के साथ खेलो और खुद अन्य महिलाओं के पास बैठकर बातें करने लगती थी।

एक दिन आयु में 7-8 वर्ष की दो कन्याओं के साथ मैं स्टेपू खेल रहा था। वो दोनों कन्याएँ एक तरफ़ थी और मैं अकेला था। इसके अलावा मुझे खेलने भी कम आता था और मुझे स्टेपू के नियम-कायदों की ज्यादा जानकारी भी नहीं थी, इसलिए वो दोनों बार-बार जीत रही थी और मैं पहली स्टेज पर ही अटका रहता था।

हमारे पड़ोस की एक आयु में 14-16 वर्ष की कन्या पिंकी(उनका नाम पिंकी है, लेकिन वो मुस्लिम है) दीदी ने देखा कि ये दोनों धूर्त कन्याएँ इस मासूम बालक को उल्लू बना-बनाकर जीत रही है और ये नादान बालक कुछ समझ भी नहीं रहा है।

पिंकी दीदी ने आकर पहले तो उन दोनों कन्याओं से कहा कि तुम दोनों को बेईमानी करते हुए शर्म नहीं आती ? वो भी इस नादान बच्चे के साथ ? चलो, मैं भी खेलती हूँ, अब जीतकर दिखाओ ?

इस तरह पिंकी दीदी मेरी ओर हो गई और हम जीतने लगे। पिंकी दीदी दबंग स्वभाव की और बोलने में तेज थी, इसलिए पिंकी दीदी के सामने उन दोनों कन्याओं का कुछ बस भी नहीं चल रहा था।

कुछ देर बाद एक आयु में 10-11 वर्ष की कन्या ममता दीदी आकर उन दोनों कन्याओं के साथ हो गई और एक आयु में 14-16 वर्ष की ही कन्या मंजू दीदी आकर हमारी ओर हो गई। इस तरह स्टेपू का खेल रोमांचक और गंभीर हो गया।

अगले चार-पाँच दिन तक रोज इसी तरह दोपहर को पिंकी दीदी, मंजू दीदी और मैं एक ओर होकर और ममता दीदी और वो दोनों कन्याएँ निशा और रजनी दूसरी ओर होकर खेलते थे। हमारी टीम में पिंकी दीदी और मंजू दीदी कुशल, तेज-तर्रार और अनुभवी खिलाड़ी थी, इसलिए प्रतिद्वंद्वी टीम कुछ कर नहीं पा रही थी।

फिर हमारे पड़ोस की एक आयु में 22-23 वर्ष की युवती गोगी दीदी आकर पिंकी दीदी और मंजू दीदी से बोली कि ऐन्ना उत्ते कि होशियारी दिखान्दी पैयी हो, हिम्मत है, या बराबर दी नाळ खेडो ? अर्थात इन पर क्या गुंडागर्दी दिखा रही हो, हिम्मत है, तो बराबर वाली के साथ खेलो ?

पिंकी दीदी ने कहा कि तू भी खेल ल फेर, आजा।

इस तरह गोगी दीदी भी हमारे साथ खेलने लगी।

पहले तो सभी साथ ही खेल रहे थे, लेकिन फिर धीरे-धीरे रोमांचक मुकाबला होने के कारण गोगी दीदी, पिंकी दीदी, मंजू दीदी, ममता दीदी गंभीर होकर वो चारों अलग खेलने लगी और हमें अलग खेलने के लिए बोल दिया।

अगले कुछ दिन वो चारों आपस में ही खेलती थी।

इसके बाद हमारे पड़ोस की एक आयु में 24-25 वर्ष की आन्टी(वो विवाहित थी, इसलिए हम उनको आन्टी ही बोलते थे) ने गोगी दीदी से कहा कि इतनी बड़ी होकर बच्चों के साथ खेलते हुए शर्म नहीं आती ?

आन्टी और गोगी दीदी के बीच हँसी-मज़ाक में एक-दूसरे को चैलेन्ज देते हुए बातचीत हुई और बाकी लड़कियों को अलग करके वो दोनों आपस में खेलने लगी।

आन्टी के खेलना शुरू करने के बाद एक-एक करके हमारे आस-पड़ोस की आयु में 16-18 वर्ष की कन्याओं से लेकर 35-40 वर्ष तक की कई महिलाएँ रोज ही दोपहर के समय स्टेपू खेलने लगी।

आमतौर पर दीदी और मम्मी कैटेगरी की महिलाएँ बच्चों और भैया कैटेगरी के युवकों को बुलाती है कि खेल-कूद बहुत हो गई, अब घर चलो।

लेकिन उस समय लगभग सालभर तक स्थिति यह थी कि बच्चे और भैया कैटेगरी वाले मम्मी और दीदी कैटेगरी को कहते थे कि बहुत खेल-कूद हो गई, अब थोड़ा चाय और कुछ खाने-पीने का भी देख लो।

इससे आप यह समझ सकते हैं कि शर्म और झिझक केवल तभी तक होती है, जब तक किसी के द्वारा शुरुआत नहीं होती। एक बार किसी के द्वारा शुरुआत होने के बाद कड़ी से कड़ी जुड़ती रहती है। हमारी आयु और हमारे जीवन में लोग बढ़ने के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारियाँ बढ़ती रहती है, लेकिन समय मिलने पर या समय निकालकर यदि हम चाहें, तो किसी भी आयु में अपने बचपन के दिनों में लौट सकते हैं।
..............................#Varman_Garhwal
10-06-2021, #वर्मन_गढ़वाल
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