Monday, August 9, 2021

वायरल वीडियो - बचपन का प्यार

 पिछले कुछ दिन से सोशल साइट्स पर "जान मेरी जानेमन, बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे" गाना गाने वाले बच्चे सहदेव पर ढ़ेर सारे पोस्ट किये जा रहे हैं।


पहले मुझे लगा कि शायद कोई छोटा बच्चा गाना गाकर किसी लड़की को इम्प्रेस करने का प्रयास कर रहा था, इसलिए लोग इस बच्चे का मज़ाक उड़ा रहे हैं।

आज यूट्यूब पर मैंने इस बच्चे सहदेव का वीडियो देखा, तो मालूम हुआ कि ऐसा तो कुछ भी नहीं है। एक युवा या मध्यम आयु के मैच्योर व्यक्ति ने बच्चे को गाना गाने के लिए कहा और बच्चे के गाना गाने पर बच्चे का वीडियो बना लिया। वीडियो वायरल हो गया, इसलिए बच्चा चर्चा में आ गया।

इस बच्चे पर कई तरह के कटाक्ष किये गये है।

विदेशी बच्चे गोल्ड मेडल जीतने की तैयारी करते है और भारतीय बच्चे गाने गाते है।

इस बच्चे की तरह अधिकांश लोग बचपन में भी अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते हैं, किशोरावस्था में भी में भी अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते हैं, युवावस्था में भी अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते हैं, मध्यम आयु अर्थात मिडिल एज के महिला-पुरुष भी अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते हैं और बुजुर्ग महिला-पुरुष भी अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते हैं।

जो लोग दब्बू स्वभाव के होते हैं, वो अकेले में अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते हैं और जो लोग खुले स्वभाव के होते हैं, वो लोग सबके सामने अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते हैं। कुछ वर्ष पहले एक डब्बू अंकल ने अपनी रिश्तेदारी में एक विवाह समारोह में नृत्य अर्थात डांस भी किया था और बहुत वायरल हुए थे।

ऑलंपिक में भाग लेने वाले अधिकांश खिलाड़ी भी बचपन से अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते रहे होंगे। विदेशी खिलाड़ी अपने-अपने देश के अपनी-अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते रहे होंगे और नीरज चोपड़ा सहित भारतीय खिलाड़ी अपनी पसन्द के भारतीय गाने गुनगुनाते या गाते रहे होंगे।

सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे महान क्रिकेटर भी अपनी पसन्द के गाने गुनगुनाते या गाते रहे होंगे। भारत के विस्फोटक बल्लेबाज वीरेन्द्र सेहवाग तो कभी-कभी बल्लेबाजी करते हुए भी गाने गाया करते थे।

इन उदाहरण के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि इस बच्चे की तरह गाने तो बहुत लोग गुनगुनाते या गाते हैं। गाने में बुराई हो सकती है, गाने के बोल खराब हो सकते है, गाने के बोल आपत्तिजनक(चोली के पीछे क्या है ?, तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त, इत्यादि घटिया बोल वाले) हो सकते है, लेकिन गाना गाने में अर्थात सिंगिंग में कोई बुराई नहीं है।

भारतीय बच्चे मोबाइल में टिक-टोक जैसे वीडियो बनाने में व्यस्त है।

शाहरुख खान की एक फिल्म "स्वदेश" है और एक फिल्म "डॉन" है। अगर हम कहें कि फिल्म बनाना ही गलत है, तो स्वदेश जैसी प्रेरणादायी फिल्में भी नहीं बन पाएँगी। इसी प्रकार रोक-टोक केवल अनुचित बातों पर लगानी चाहिए। अगर कोई बच्चा अच्छे वीडियो बनाता है, तो बच्चे का उचित मार्गदर्शन करके बच्चे को प्रोत्साहित करना चाहिए।

हमारे देश में मन्ना डे साहब, मुकेश, महेन्द्र कपूर, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, पंकज उदास, उदित नारायण, कुमार सानू,कविता कृष्णमूर्ति, मोहम्मद अज़ीज, अल्का याज्ञिनी जैसे ढ़ेर सारे गायक-गायिका हुए है।

इन सभी गायक-गायिका ने युवा होने के बाद एकदम से गाना शुरू किया नहीं होगा ? ये सभी बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद के साथ-साथ अपने गायन पर भी ध्यान देते रहे, तब जाकर गायन के क्षेत्र में सफल हुए।

अभी कल या परसो ही एक पोस्ट में पढ़ा था कि किशोर कुमार साहब को शुरुआती दिनों में नकार दिया गया था। फिल्म इंडस्ट्री वालों ने कहा कि किशोर कुमार को संगीत की समझ ही नहीं है, लेकिन फिर भी किशोर कुमार निरंतर प्रयास करते रहे और एक सफल गायक बने।

अब विचार करने वाली बात यह है कि मोहम्मद रफी, मन्ना डे, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, पंकज उदास, उदित नारायण, कुमार सानू, अल्का याज्ञिनी जैसे गायक-गायिका को गाना गाने से रोककर जबरदस्ती ऑलंपिक में भेज दिया जाता, तो क्या ये लोग मेडल लेकर आते ? जिनकी रूचि गायक-गायिका बनने में है, उनको खेलकूद में भेजेंगे, तो वो लोग कैसे सफल होंगे ?

वीरेन्द्र सेहवाग को क्रिकेट खेलने से रोककर गायक बनने के लिए भेजा जाता, तो क्या वीरेन्द्र सेहवाग गायिकी में सफल होते ?

हाँ, गायक-गायिका स्वस्थ रहने और मनोरंजन के लिए खाली समय में अपनी-अपनी पसन्द के अनुसार खेल सकते हैं और खिलाड़ी खाली समय में या मन करने पर अपनी-अपनी पसन्द के गाने गुनगुना या गा सकते हैं।

अगर इस बच्चे को गायक बनने में रूचि है, तो मेहनत करके प्रयास करके गायक बन भी सकता है। वरना अन्य सभी लोगों की तरह गुनगुनाना या गाना तो है ही।

मैं व्यक्तिगत तौर पर यह नहीं कहूँगा कि ये बच्चा बहुत होनहार है। क्योंकि सभी लोग बचपन में कई तरह के सपने देखते रहते हैं। कभी किसी सीरियल में पुलिस ऑफिसर से प्रभावित होकर पुलिस ऑफिसर बनने के सपने देखते हैं, कभी फौजी से प्रभावित होकर फौज में जाने के सपने देखते हैं, कभी फिल्म स्टार बनने के सपने देखते हैं, कभी क्रिकेटर बनने के सपने देखते हैं। मैंने भी अपने बचपन में कई तरह के बड़े-बड़े सपने देखें है। आप सभी ने भी देखे होंगे। लेकिन बड़े होकर बच्चे क्या बनते है ? यह बच्चे के परिवेश, बच्चे की परवरिश, बच्चे के खुद के प्रयासों और बच्चे के जीवन की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
..............................#Varman_Garhwal
09-08-2021, #वर्मन_गढ़वाल
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Friday, July 23, 2021

घरेलू महिलाएँ बनाम कामकाजी महिलाएँ

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अधिकांश लोगों के दिमाग में कामकाजी महिला अर्थात "वर्किंग वूमन" शब्द सुनकर केवल ऑफ़िस वर्क करने वाली महिलाओं की छवि उभरती है, इसलिए अधिकांश लोग गृहणी महिलाओं अर्थात केवल घर के कार्य करने वाली महिलाओं की तुलना केवल ऑफ़िस वर्क करने वाली महिलाओं के साथ करते हैं।

मैंने दो-तीन दिन में "घरेलू महिला बनाम कामकाजी महिला" पर 20-22 पोस्ट पढ़े है। सभी पोस्ट में घरेलू महिलाओं की तुलना केवल ऑफ़िस वर्क करने वाली महिलाओं के साथ की गई है। इन सभी पोस्टकर्ताओं के अनुसार कामकाजी महिला का अर्थ केवल ऑफ़िस वर्क तक सीमित है।

असल में इन पोस्टकर्ताओं को केवल ऑफ़िस वर्क करने वाली महिलाओं से उलझना है। क्योंकि ऑफ़िस वर्क करने वाली अधिकांश महिलाएँ सोशल साइट्स का उपयोग करती है, इसलिए ऑफ़िस वर्क करने वाली महिलाएँ फुर्सत मिलने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करके इन पोस्टकर्ताओं को प्रसिद्ध कर सकती है।

भारत में बहुत सारी महिलाएँ मजदूरी भी करती है। सुबह घर से निकलती है और शाम तक कठोर परिश्रम करके घर लौटती है। इस तरह ढ़ेर सारी मजदूर महिलाएँ घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी में लगभग बराबर का आर्थिक सहयोग देती है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि ये मजदूर महिलाएँ दिनभर कठोर परिश्रम करने के बाद घर के कार्य भी करती है।

भारत में बहुत सारी महिलाएँ खेती-बाड़ी के काम भी करती है। सुबह घर से निकलती है और शाम तक कठोर परिश्रम करके घर लौटती है। ये किसान महिलाएँ भी घर आकर घर के कार्य भी करती है।

इसी प्रकार बहुत सारी महिलाएँ सिलाई कढ़ाई का कार्य करती है, ब्यूटी पार्लर का कार्य करती है, किरयाना की या मनिहारी की दुकान चलाती है, चाय-नाश्ते की दुकान चलाती है। हमारे राजस्थान में बहुत सी महिलाएँ पापड़, बड़ी, अचार इत्यादि बनाती है। बहुत सी महिलाएँ चुनरी बनाती है।

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि ये सभी महिलाएँ कामकाजी महिलाओं की श्रेणी में आती है या कामकाज का अर्थ केवल ऑफ़िस वर्क तक सीमित हो गया है ?

अगर कामकाज का अर्थ केवल ऑफ़िस वर्क है, तो अधिकांश पुरुषों के कार्य का कोई महत्व ही नहीं रहेगा।

और अगर कामकाजी होने का अर्थ आर्थिक जिम्मेदारी में अपना योगदान देना है, तो निश्चित रूप से केवल घर के कार्य करने वाली महिलाओं की तुलना में कामकाजी महिलाएँ श्रेष्ठ है। सभी महिलाएँ अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार मजदूरी, खेती-बाड़ी, सिलाई-कढ़ाई, दुकानदारी, नौकरी इत्यादि करके अपने घर-परिवार में अपना आर्थिक योगदान देती है।

एक तरफ़ तो कहा जाता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। और दूसरी तरफ़ ऑफ़िस वर्क के अतिरिक्त अन्य कार्य करने वाली महिलाओं को महत्व ही नहीं दिया जाता ?

अब आप विचार कीजिए कि मजदूरी से लेकर ऑफ़िस वर्क तक अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार धन कमाने वाली महिलाएँ श्रेष्ठ है या धन के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर महिलाएँ श्रेष्ठ है ?

अधिकांश पुरुषों को भी कामकाजी महिलाएँ ही श्रेष्ठ लगती है। जिन महिलाओं को केवल घर के कार्य ही आते है, उनके घर में आर्थिक संकट आने पर घर के लड़के या पुरुष असहाय और अकेलापन महसूस करते है। क्योंकि पत्नी या माता को तो घर के काम के अलावा कुछ आता ही नहीं है। पत्नी या माता में तो कोई योग्यता ही नहीं है।

यहाँ यह भी जानना आवश्यक है कि कामकाजी महिलाओं के घर में आवश्यकता पड़ने पर घर के कार्य पति या बेटे भी कर लेते हैं। माँ व्यस्त है, तो कपड़े-बर्तन बेटे या बेटी ने धो दिये। पत्नी व्यस्त है, तो भोजन पति ने बना दिया। ये सब साधारण घरों में सामान्य बात है।

भारत के साधारण घरों में अक्सर बच्चे के बीमार होने पर पत्नी मजदूरी करने या फैक्टरी वगैरह में काम करने चली जाती है और पति बच्चे को डॉक्टर के पास लेकर जाता है। पति खुद ही बोल देता है कि तुम चली जाओ, बच्चे को मैं दिखा लाऊँगा। यह सब पति-पत्नी की समझदारी और पति-पत्नी के आपसी तालमेल पर निर्भर करता है।

आजकल तो लड़के वाले रिश्ता करते समय लड़की वालों से पूछते भी है कि आपकी लड़की को घर के कामों के अलावा और क्या-क्या आता है ? और फिर वरीयता उसी लड़की को दी जाती है, जो घर के कामों के अलावा धन कमाने के कुछ कार्य भी जानती हो।

जहाँ तक बात ऑफ़िस वर्क करने वाली महिलाओं के घमंडी होने की है, तो इसका महिला-पुरुष से कोई संबंध नहीं है। सरकारी नौकरी मिलने के बाद या अत्यधिक धन कमाने वाले पुरुषों में भी घमंड आ जाता है। यह एक अलग विषय है।

जैसे सरकारी नौकरी करने वाले पुरुष मजदूरी करने वालों पुरुषों को अपने से छोटा मानते हैं, उसी प्रकार बड़े स्तर की नौकरी करने वाली महिलाएँ अन्य महिलाओं को अपने से कमतर समझने लगती है।

उदाहरण के लिए कुछ संपन्न घरों में महिला को केवल घर के काम भी पूरी तरह नहीं आते हो, वो महिला तब भी सभी घर के सभी कार्य करने में निपुण नौकरानी को तुच्छ ही समझती है। जबकि नौकरानी तो अपने घर में आर्थिक सहयोग करने वाली वर्किंग वूमन ही है।
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लेेेखक - वर्मन गढ़वाल

Saturday, June 12, 2021

मेरे बचपन की यादें - भाग - 2

 आज मेरे बचपन की अर्थात जब मेरी आयु आठ-दस वर्ष से कम थी, तब की दो बातें बताता हूँ।

हमारे मोहल्ले में तो सबके घर साधारण से थे। किसी के घर डोरबेल वगैरह नहीं थी, लेकिन हमारे मोहल्ले के आस-पास की कॉलोनी में कई नौकरीपेशा लोग रहते थे। उन सबके घर पर डोरबेल लगी हुई थी।

मैं अक्सर हमारे आस-पड़ोस के मेरी उम्र वाले लड़के-लड़कियों को लेकर दोपहर के समय उनके घर की ओर जाता था और उनके घर की डोरबेल बजाते थे।

मेरे डोरबेल बजाते ही अन्य सभी लड़के-लड़कियाँ भाग जाते थे, लेकिन मैं वहीं आस-पास बैठ जाता था या खड़ा रहता था। मेरे चेहरे के हाव-भाव और मेरी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती थी, जैसे मैंने तो कुछ किया ही नहीं। मुझे खुद इस तरह डोरबेल बजाकर लोगों को परेशान करना बुरा लग रहा है।

जब घर से आन्टी या भैया-दीदी बाहर आकर मुझे देखते थे, तो मेरी ऐसी मासूमियत भरी बॉडी लैंग्वेज देखकर मुझसे ही पूछते थे कि घंटी किसने बजाई ?

मैं मासूमियत से बता देता था कि वो इधर से चार-पाँच लड़के-लड़कियाँ आए थे। वो चार-पाँच लड़के-लड़कियाँ उधर भाग गये।

मेरी बात सुनकर आन्टी, भैया, दीदी जो भी होते थे, वो बच्चों को बिगड़ैल, आवारा वगैरह बोलकर वापस अन्दर चले जाते थे।

हालाँकि कुछ समय बाद उन सबको पता चल गया कि सभी बच्चों को घेर-घारकर लाता तो यहीं है, लेकिन सबको पता चलने के बाद मैंने डोरबेल बजाना ही छोड़ दिया।

इसी तरह स्कूल में भी पहली क्लास से ही मेरी मासूम और भोली-भाली छवि बनी हुई थी।

मैं अक्सर दूसरे बच्चों को परेशान करता था और जो बच्चे मेरे सामने ज्यादा होशियारी दिखाते थे, उनको पीट भी देता था, लेकिन जब टीचर को मेरी शिकायत करने जाते, तो मैं खुद ही रोने लग जाता था।

इस तरह पहली क्लास से पाँचवी क्लास तक जब भी किसी बच्चे ने टीचर से मेरी शिकायत की, टीचर का हर बार यहीं जवाब होता था कि इसको दो साल हो गये इस स्कूल में। आज तक कभी इसकी कोई शिकायत नहीं आई कि इसने किसी को परेशान किया है, किसी को गाली दी है या किसी को मारा-पीटा है ?

इसमें मैडम के डायलॉग में प्रतिवर्ष केवल साल बढ़ जाता था, जैसे कि इसको तीन साल हो गये इस स्कूल में। इसको चार साल हो गये इस स्कूल में। बाकी डायलॉग पाँचवी तक सेम ही रहा था।

इससे आप यह समझ सकते हैं कि हमारे चेहरे के हाव-भाव और हमारी बॉडी लैंग्वेज अर्थात हमारे एक्सप्रेशन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। मैं थोड़ा-थोड़ा टाइम लगभग आधे भारत के कई शहरों और गाँवों में रह चुका हूँ। सभी जगह पर मुझसे मिलने वालों लोगों को लगा कि मैं वहीं का ही हूँ। यहाँ तक कि साउथ इंडिया में भी लोग यहीं समझते थे कि मैं साउथ इंडियन ही हूँ, बस मुझे साउथ इंडियन भाषा नहीं आती।

इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप अन्जान लोगों को लूटने वालों की लिस्ट से बाहर हो जाते हैं। क्योंकि ये लूटने वाले मोस्टली बाहर से आए हुए अन्जान लोगों को ही अपना शिकार बनाते हैं। हालांकि दिल्ली में ये सारे समीकरण फैल हो जाते हैं। क्योंकि दिल्ली में ही पले-बढ़े मेरे कई मित्र कई बार इनका शिकार बन चुके हैं।

एक-दो बार शिकार बनना सामान्य बात है, लेकिन चार-पाँच बार या आठ-दस बार शिकार बन रहे हैं ? इसका मतलब दिल्ली का कुछ अलग ही गणित है, जो दिल्ली में पले-बढ़े लोगों को समझ से भी बाहर है।

खैर, खुद को इस तरह वातानुकूलित बनाने के लिए सबको अपना समझना आवश्यक है। अगर हम हर गाँव को, हर शहर को, हर देश को अपना समझेंगे, तो कोई भी यह नहीं कह सकता कि हम बाहर से आए है। सबको यहीं लगेगा कि हम वहीं कहीं आस-पास के ही है, बस हमें भाषा नहीं आती, हमारा पहनावा और खान-पान अलग है।
..............................#Varman_Garhwal
07-06-2021, #वर्मन_गढ़वाल
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Wednesday, June 9, 2021

मेरे बचपन की यादें - भाग -1

 सभी मित्रों और सखियों को सप्रेम नमस्कार,

आप सभी का "मेरे बचपन की यादें" प्रोग्राम(वैसे ये यूट्यूब या टीवी का प्रोग्राम तो नहीं है, लेकिन फिर भी आप लोग imagine कर लेना।) में तहे दिल से स्वागत है।

आज मैं आपको "स्टापू" के बारे में बताऊँगा। मैंने पिछले 15-16 वर्ष से किसी को स्टापू खेलते हुए नहीं देखा, इसलिए मुझे मालूम नहीं है कि अभी के बच्चे स्टापू खेलते हैं या नहीं खेलते हैं ? लेकिन मेरे बचपन में हमारे आस-पड़ोस की लड़कियाँ सबसे अधिक स्टापू ही खेलती थी।

स्टापू को स्टेपू भी कहते है। हमारे यहाँ इसे स्टेपू ही कहते थे। स्टेपू मिट्टी के टूटे हुए घड़े का छोटा-सा चकोर या गोल टुकड़ा होता है। बड़ी उम्र की लड़कियाँ इसे मार्बल के टुकड़े से भी बना लेती थी।

स्टेपू खेलने के लिए जमीन पर 6 या 8 आयताकार या वर्गाकार डिब्बे बनाने होते हैं और स्टेपू उन डिब्बों में लगड़ी टाँग से कूद-कूदकर 4-5 अलग-अलग तरीके से खेला जाता है। स्टेपू मुख्य रूप से लड़कियों का अर्थात कन्याओं का खेल है। वैसे हमारे यहाँ छोटे लड़के अर्थात बालक भी कभी आपस में बालक-बालक और कभी कन्याओं के साथ स्टेपू खेलते थे। 

स्टेपू खेलने के सभी तरीके पूरी तरह मुझे याद नहीं है। मुझे केवल इतना याद है कि स्टेपू में स्टेज होती थी, जिसे एक-एक करके पार करना होता था। पहले एक खाने में स्टेपू फेंको, फिर लगड़ी टाँग कूद-कूदकर अंतिम खाने तक जाओ और वापस आकर पहली स्टेज पार करके अगली बार स्टेपू दूसरे खाने में फेंककर यहीं प्रकिया दोहरानी होती थी।

स्टेपू की सारी स्टेज पार करने के बाद अंत में किसी एक खाने पर अधिकार करना होता था। जिस खाने पर अधिकार होता था, उस खाने पर अधिकार करने वाली कन्या उस खाने में दोनों पैर रख सकती थी और प्रतिद्वंद्वी कन्या को वो खाना कूदकर जाना पड़ता था।

इसमें एक नियम यह भी था कि खाने पर अधिकार करने वाली कन्या अपनी प्रतिद्वंद्वी कन्या से पूछती थी कि डायी अर्थात बारी या टर्न(like it's my turn, it's my turn आप समझ गये होंगे कि डायी या बारी का अर्थ क्या है ?) चाहिए या रास्ता ?

अगर प्रतिद्वंद्वी कन्या डायी माँगती थी, तो उसे खाना(डिब्बा। भोजन मत समझ लेना) कूदकर जाना पड़ता था और अगर प्रतिद्वंद्वी कन्या रास्ता माँगती थी, तो खाने पर अधिकार करने वाली कन्या खाने में लकीर खींचकर खाने की थोड़ी-सी जगह पैर रखने के लिए दे देती थी और पुनः पहली स्टेज से शुरू करती थी।

इस स्टेपू खेल में खानों को अलग-अलग क्षेत्र या राज्य मान लीजिए और खेलने वाली कन्याओं और खेलने वाले बालकों को प्रतिद्वंद्वी योद्धा मान लीजिए। इस तरह सबसे अधिक खानों पर अर्थात सबसे अधिक क्षेत्रों पर अधिकार करने वाली कन्या विजयी होकर पराजित होने वाली प्रतिद्वंद्वी कन्या को सज़ा देती थी।

इसके अतिरिक्त स्टेपू के कुछ और भी नियम-कायदे थे, तो वो मुझे याद नहीं है। मैं तो इस खेल का नाम भी भूल गया था। इस खेल का नाम मैंने Neeraj Puri माता जी से पूछा। अब इस खेल से जुड़ा मेरे बचपन का एक किस्सा बताता हूँ।

90 के दशक में टीवी पर केवल दूरदर्शन चलता था और दूरदर्शन भी सुबह 11 बजे से शाम के 4 बजे तक बंद रहता था। 1997-98 से पहले दूरदर्शन केवल रविवार को पूरा दिन चलता था। इसके अलावा मोबाइल उस समय आए ही नहीं थे, इसलिए उस समय हमारे मोहल्ले की महिलाएँ घर के काम निपटाकर दोपहर के समय बाहर आकर गर्मियों में पेड़ों की छाँव में बैठकर और सर्दियों में धूप में बैठकर स्वेटर बुनने या इस टाइप के अपने-अपने काम करती हुई आपस में अपने-अपने बचपन की, अपने-अपने रिश्तेदारों की, अपने-अपने घर की परेशानियों इत्यादि पर बातचीत करके टाइमपास किया करती थी और महिलाओं के आस-पास या महिलाओं से थोड़ी दूर बच्चे खेलते रहते थे।

इसी तरह जब मेरी आयु 3-4 वर्ष की थी, तब दोपहर के समय मेरी मम्मी भी मुझे लेकर बाहर आकर बच्चों को बोल देती थी कि इसको भी अपने साथ खिलाओ या मुझे बोल देती थी कि जाओ, बच्चों के साथ खेलो और खुद अन्य महिलाओं के पास बैठकर बातें करने लगती थी।

एक दिन आयु में 7-8 वर्ष की दो कन्याओं के साथ मैं स्टेपू खेल रहा था। वो दोनों कन्याएँ एक तरफ़ थी और मैं अकेला था। इसके अलावा मुझे खेलने भी कम आता था और मुझे स्टेपू के नियम-कायदों की ज्यादा जानकारी भी नहीं थी, इसलिए वो दोनों बार-बार जीत रही थी और मैं पहली स्टेज पर ही अटका रहता था।

हमारे पड़ोस की एक आयु में 14-16 वर्ष की कन्या पिंकी(उनका नाम पिंकी है, लेकिन वो मुस्लिम है) दीदी ने देखा कि ये दोनों धूर्त कन्याएँ इस मासूम बालक को उल्लू बना-बनाकर जीत रही है और ये नादान बालक कुछ समझ भी नहीं रहा है।

पिंकी दीदी ने आकर पहले तो उन दोनों कन्याओं से कहा कि तुम दोनों को बेईमानी करते हुए शर्म नहीं आती ? वो भी इस नादान बच्चे के साथ ? चलो, मैं भी खेलती हूँ, अब जीतकर दिखाओ ?

इस तरह पिंकी दीदी मेरी ओर हो गई और हम जीतने लगे। पिंकी दीदी दबंग स्वभाव की और बोलने में तेज थी, इसलिए पिंकी दीदी के सामने उन दोनों कन्याओं का कुछ बस भी नहीं चल रहा था।

कुछ देर बाद एक आयु में 10-11 वर्ष की कन्या ममता दीदी आकर उन दोनों कन्याओं के साथ हो गई और एक आयु में 14-16 वर्ष की ही कन्या मंजू दीदी आकर हमारी ओर हो गई। इस तरह स्टेपू का खेल रोमांचक और गंभीर हो गया।

अगले चार-पाँच दिन तक रोज इसी तरह दोपहर को पिंकी दीदी, मंजू दीदी और मैं एक ओर होकर और ममता दीदी और वो दोनों कन्याएँ निशा और रजनी दूसरी ओर होकर खेलते थे। हमारी टीम में पिंकी दीदी और मंजू दीदी कुशल, तेज-तर्रार और अनुभवी खिलाड़ी थी, इसलिए प्रतिद्वंद्वी टीम कुछ कर नहीं पा रही थी।

फिर हमारे पड़ोस की एक आयु में 22-23 वर्ष की युवती गोगी दीदी आकर पिंकी दीदी और मंजू दीदी से बोली कि ऐन्ना उत्ते कि होशियारी दिखान्दी पैयी हो, हिम्मत है, या बराबर दी नाळ खेडो ? अर्थात इन पर क्या गुंडागर्दी दिखा रही हो, हिम्मत है, तो बराबर वाली के साथ खेलो ?

पिंकी दीदी ने कहा कि तू भी खेल ल फेर, आजा।

इस तरह गोगी दीदी भी हमारे साथ खेलने लगी।

पहले तो सभी साथ ही खेल रहे थे, लेकिन फिर धीरे-धीरे रोमांचक मुकाबला होने के कारण गोगी दीदी, पिंकी दीदी, मंजू दीदी, ममता दीदी गंभीर होकर वो चारों अलग खेलने लगी और हमें अलग खेलने के लिए बोल दिया।

अगले कुछ दिन वो चारों आपस में ही खेलती थी।

इसके बाद हमारे पड़ोस की एक आयु में 24-25 वर्ष की आन्टी(वो विवाहित थी, इसलिए हम उनको आन्टी ही बोलते थे) ने गोगी दीदी से कहा कि इतनी बड़ी होकर बच्चों के साथ खेलते हुए शर्म नहीं आती ?

आन्टी और गोगी दीदी के बीच हँसी-मज़ाक में एक-दूसरे को चैलेन्ज देते हुए बातचीत हुई और बाकी लड़कियों को अलग करके वो दोनों आपस में खेलने लगी।

आन्टी के खेलना शुरू करने के बाद एक-एक करके हमारे आस-पड़ोस की आयु में 16-18 वर्ष की कन्याओं से लेकर 35-40 वर्ष तक की कई महिलाएँ रोज ही दोपहर के समय स्टेपू खेलने लगी।

आमतौर पर दीदी और मम्मी कैटेगरी की महिलाएँ बच्चों और भैया कैटेगरी के युवकों को बुलाती है कि खेल-कूद बहुत हो गई, अब घर चलो।

लेकिन उस समय लगभग सालभर तक स्थिति यह थी कि बच्चे और भैया कैटेगरी वाले मम्मी और दीदी कैटेगरी को कहते थे कि बहुत खेल-कूद हो गई, अब थोड़ा चाय और कुछ खाने-पीने का भी देख लो।

इससे आप यह समझ सकते हैं कि शर्म और झिझक केवल तभी तक होती है, जब तक किसी के द्वारा शुरुआत नहीं होती। एक बार किसी के द्वारा शुरुआत होने के बाद कड़ी से कड़ी जुड़ती रहती है। हमारी आयु और हमारे जीवन में लोग बढ़ने के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारियाँ बढ़ती रहती है, लेकिन समय मिलने पर या समय निकालकर यदि हम चाहें, तो किसी भी आयु में अपने बचपन के दिनों में लौट सकते हैं।
..............................#Varman_Garhwal
10-06-2021, #वर्मन_गढ़वाल
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Sunday, May 9, 2021

स्वास्थ्य और चिकित्सा

अब से 15 वर्ष पहले तक भारत के साधारण और गरीब घरों की महिलाओं को माथे पर हाथ रखकर, कलाई पकड़कर नस जाँचने, सीने पर हाथ रखकर, पेट मसलकर, पेट को अलग-अलग तरह से दबाकर सामान्य सर्दी-जुकाम, सामान्य पेटदर्द, सामान्य सरदर्द, सामान्य सिर चकराने, सामान्य बुखार, सामान्य कमज़ोरी जैसे रोगों की गंभीरता जाँचने की समझ होती थी, इसलिए अनुभवी और जानकार महिलाएँ रोगी की जाँच करके बता देती थी कि रोगी घर पर ही घरेलू उपचार से स्वस्थ हो सकता है या फिर डॉक्टर के पास ले जाने की आवश्यकता है ?


इस तरह रोगी का घर पर ही स्वस्थ होना संभव होने पर महिलाएँ बीमारी की जाँच करके बीमारियों का निदान घर पर ही ढ़ेर सारे घरेलू उपचार से कर दिया करती थी। मुझे इन घरेलू उपचार के बारे में जानकारी तो नहीं है, लेकिन जब मैं छोटा था, तब हमारे आस-पड़ोस की ज्यादातर महिलाओं को इस प्रकार रोग की जाँच करना आता था और महिलाएँ अजवाइन, इसबगोल, पतासे, फिटकरी, लौकी का जूस, करेले का जूस, आम के पत्ते, पान के पत्ते, शहद, लौंग, जैसी ढ़ेर सारी चीज़ों से अलग-अलग बीमारी के लिए अलग-अलग घरेलू औषधि बनाकर रोगी को देती थी और किसी प्रकार की दवाईयों का सेवन किये बिना ही रोगी स्वस्थ हो जाते थे।


मेरी आयु सात-आठ वर्ष थी, तब की बात है। एक बार मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हुआ। हमारे पड़ोस की एक महिला यू ही हमारे घर आयी। मेरी मम्मी ने उनको मेरे पेटदर्द के बारे में बताया। उन्होंने मेरे पेट को मसलकर, अलग-अलग तरह से दबा-दबाकर देखा और और अजवाइन वगैरह का कुछ बनाकर पानी के साथ पिलाने के लिए कहा। मेरी मम्मी ने उनके बताए अनुसार दो-चार चीज़ों से घरेलू औषधि बनाकर मुझे पिलाई और पाँच मिनट में ही मेरा पेटदर्द बिल्कुल ठीक हो गया। यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है कि उन आन्टी ने कोई तुक्का नहीं मारा था। यदि मेरे पेटदर्द का उपचार घर पर संभव नहीं होता, तो वो डॉक्टर के पास ले जाने के लिए बोल देती। उन्होंने मेरा पेट मसलकर, दबा-दबाकर देखा, तो पाया कि मेरा पेटदर्द सामान्य है, इसीलिए उन्होंने वो घरेलू उपचार बताया।


पहले साधारण और गरीब घरों की बहुत सी महिलाओं को इस तरह रोग की जाँच करने और रोग के घरेलू उपचार की जानकारी होती थी, इसलिए पहले अधिकांश लोग सामान्य बीमारी होने पर घर पर ही घरेलू उपचार से स्वस्थ हो जाते थे और दवाईयों का सेवन कम से कम करते थे।


इसके अतिरिक्त पहले के साधारण और गरीब लोगों में बीमार होने पर नाड़ी वैद्य से ईलाज करवाने का चलन अधिक था। नाड़ी वैद्य भी रोगी के माथे पर हाथ रखकर, सीने पर हाथ रखकर, कलाई पकड़कर नस की जाँच करके, पेट मसलकर, पेट दबा-दबाकर इत्यादि तरीकों से ही रोगी की जाँच करके रोग का उपचार बताते हैं।


मेरे पिताजी को 15-16 वर्ष की आयु में टीबी हो गई थी और टीबी ठीक होने के बाद साँस की तकलीफ़ हो गई। अब से लगभग 20 वर्ष पहले की बात है। एक बार मेरे पिताजी बहुत अधिक बीमार हुए। मेरे पिताजी के एक परिचित ने एक नाड़ी वैद्य को दिखाने का सुझाव दिया। उन वैद्य जी ने मेरे पिताजी की जाँच करके पिताजी को फिटकरी गर्म करके चूरा बनाकर शहद के साथ चाटने के लिए कहा और एक-दो कुछ और चीज़ों का सेवन करने के लिए कहा था। मैं उस समय बच्चा ही था, इसलिए मुझे ठीक से सब कुछ याद नहीं है, लेकिन इससे मेरे पिताजी स्वस्थ हो गये थे और अगले चार-पाँच वर्ष तक उनको स्वास्थ्य संबंधी कोई परेशानी नहीं हुई। इस प्रकार मेरे पिताजी ने अपने जीवन में कभी नाड़ी वैद्य, कभी होम्योपैथी, कभी एलोपैथी सभी तरह के उपचार लिए और 65 वर्ष तक जीवन जीया।


इसी तरह जब मेरी आयु 14 वर्ष थी, तब मेरी मम्मी के गले में कुछ प्रोब्लम हुई, जिससे मेरी मम्मी कुछ भी खाती थी, तो खाना गले में ही फँस जाता था और साँस रूक जाता था। मेरी मम्मी को हनुमानगढ़ और बीकानेर दिखाया, लेकिन सभी डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया।


मेरी मम्मी बीमार होने से पहले हेल्थी शरीर की थी, लेकिन बीमार होने के बाद केवल एक-डेढ़ महीने में बिल्कुल हड्डियों का ढांचा बन गई और उनकी हड्डियाँ दिखने लगी थी।


मेरे पिताजी भी चिंतित रहने लगे कि पत्नी मरने वाली है। मैं भी बीमार रहता हूँ। मेरा भी कोई भरोसा नहीं है। बच्चे अभी छोटे हैं। इस दौरान मेरे पिताजी के एक मित्र ने मेरी मम्मी को एक नाड़ी वैद्य को दिखाने के लिए कहा।


उन वैद्य जी ने मेरी मम्मी की रिपोर्ट वगैरह देखकर कहा कि 250 ग्राम दही में 25 ग्राम तुलसी के पत्ते पीसकर सुबह-शाम लो। इससे फायदा हो सकता है। मेरी मम्मी तीन-चार महीने में काफ़ी हद तक ठीक हो गई और अभी तक जीवित है।


यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वो वैद्य जी रोगी की जाँच करके रोगी का उपचार संभव होने पर ही कोई उपचार बताते थे। अगर किसी रोग का उपचार एलोपैथी डॉक्टर के पास होता था, तो एलोपैथी डॉक्टर के पास जाने का सुझाव देते थे। अगर किसी रोग का उपचार होम्योपैथिक डॉक्टर के पास होता था, तो होम्योपैथिक डॉक्टर के पास जाने का सुझाव देते थे।


आजकल रोग की जाँच करके सामान्य बीमारियों को घरेलू उपचार से ठीक करने वाली महिलाएँ तो लगभग विलुप्त ही हो गई है और जो थोड़ी-बहुत बुजुर्ग महिलाएँ घरेलू उपचार से सामान्य बीमारियों को ठीक करना जानती हैं, उनकी कोई सुनता नहीं है। नाड़ी वैद्य से ईलाज करवाने का चलन भी लगभग समाप्त हो गया है।


आजकल संपन्न और साधारण घरों के लोग बुखार जाँचने, ब्लड प्रेशर जाँचने, ऑक्सीजन लेवल जाँचने, हृदय की धड़कनें जाँचने इत्यादि के उपकरण घर पर ही रखते हैं, इसलिए अब तो बीमार होने पर शरीर की जाँच करके सामान्य बीमारियों का घरेलू उपचार सरल होना चाहिए और दवाईयों का सेवन पहले की तुलना में कम होना चाहिए, लेकिन आश्चर्य की बात है कि दवाईयों का सेवन पहले की तुलना में बहुत अधिक हो गया है। इस तरह दवाईयों का अनावश्यक और अत्यधिक सेवन करने से अधिकांश लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अर्थात इम्यूनिटी कमज़ोर हो रही है।


यहाँ मेरे कहने का तात्पर्य दवाईयों का सेवन समाप्त करना नहीं है, लेकिन दवाईयों का सेवन केवल आवश्यकता होने पर ही करना चाहिए। जब हमारे पास रोग को ठीक करने के लिए दवाईयों के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं हो, केवल तभी दवाईयों का सेवन करना चाहिए। क्योंकि दवाईयों का सेवन करने पर हमारे शरीर के जीवाणु मरने से हमें आराम तो तुरन्त मिलता है, लेकिन इस तरह तुरन्त आराम प्राप्त करने में हमारे शरीर के हानिकारक जीवाणुओं के साथ-साथ लाभदायक जीवाणु भी मारे जाते हैं।


हमारे शरीर के भीतर करोड़ों-अरबों की संख्या में अनगिनत जीवाणु होते हैं। इनमें से कुछ जीवाणु हमारे लिए हानिकारक होते हैं, कुछ जीवाणु हमारे लिए लाभदायक होते हैं और कुछ जीवाणु शरीर की भीतरी स्थिति के अनुसार व्यवहार करते हैं अर्थात जब हमारे शरीर के भीतर की स्थिति उन जीवाणुओं के विपरीत होती है, तब वो जीवाणु हमें हानि पहुँचाने लगते हैं और जब हमारे शरीर के भीतर की स्थिति उन जीवाणुओं के अनुकूल होती है, तब वो जीवाणु हमें लाभ पहुँचाने लगते हैं।


उदाहरण के लिए सर्दी के मौसम में ठंडी चीजें खाने से हम बीमार होते हैं, लेकिन गर्मी के मौसम में ठंडी चीजें खाना हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। हमारे बीमार होने पर डॉक्टर्स कभी खट्टी चीज़ों का सेवन अधिक करने के लिए कहते हैं और कभी स्वस्थ होने तक खट्टी चीज़ों का सेवन करने से रोक देते हैं। डॉक्टर्स इस तरह के निर्देश हमारे शरीर की भीतरी स्थिति जीवाणुओं के अनुकूल बनाने के लिए ही देते हैं।


हमारे शरीर के लिए लाभदायक जीवाणुओं को मारना तो हमारे लिए ही हानिकारक है और जो जीवाणु केवल विपरीत स्थिति में हमें हानि पहुँचाते हैं, उनको मारने की बजाय उनके लिए अनुकूल स्थिति तैयार करना अधिक उपयुक्त है। क्योंकि अनुकूल स्थिति होने पर हमारे लिए हानिकारक जीवाणुओं को वो स्वयं ही बड़ी सरलता से समाप्त कर देते हैं। इसी आधार पर वैद्य ईलाज करते हैं और घरेलू उपचार से सामान्य रोग ठीक होते हैं।


हमें हमारे शरीर के केवल उन्हीं जीवाणुओं को मारना होता है, जो हमें हर स्थिति में हमेशा हानि ही पहुँचाते हैं, लेकिन दवाईयों का सेवन करने पर सभी तरह के जीवाणु मारे जाते हैं और हानिकारक जीवाणुओं के साथ-साथ लाभदायक जीवाणु भी कम हो जाते हैं। फिर जब अगली बार किसी कारण हानिकारक जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है, तब हमारे शरीर में हानिकारक जीवाणुओं से लड़ने के लिए पर्याप्त संख्या में लाभदायक जीवाणु नहीं होते और हमें स्वस्थ होने में कठिनाई होती है। इस तरह अनावश्यक रूप से दवाईयों का अत्यधिक सेवन करने के कारण हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अर्थात इम्यूनिटी कम हो जाती है और हम बार-बार बीमार होने लगते हैं।


यहाँ जीवाणुओं के बारे में यह जान लेना भी आवश्यक है कि जीवाणु कभी-भी मरते नहीं है। जीवाणु केवल प्रतिकूल स्थिति या प्रतिकूल वातावरण होने पर निष्क्रिय होते हैं और अनुकूल स्थिति या अनुकूल वातावरण मिलने पर सक्रिय होते हैं। इसके अतिरिक्त स्थिति और वातावरण के अनुसार जीवाणु अपना रूप बदलते हैं, जीवाणु अपनी क्षमता बदलते हैं, जीवाणु अपना व्यवहार बदलते हैं, जीवाणु अपना स्वभाव बदलते हैं और जीवाणु को अपने गुणों के आधार पर जीन, सूक्ष्म जीव, विषाणु, बैक्टीरिया, वायरस इत्यादि भी कहते हैं।


अभी का कोरोना वायरस भी एक जीवाणु है। कोरोना वायरस भी कभी नहीं मरेगा। क्योंकि अभी तक ऐसी कोई तकनीक नहीं है, जिससे किसी वायरस को समाप्त किया जा सकें। कोरोना वायरस को निष्क्रिय किया जा सकता है, कोरोना वायरस का रूप बदला जा सकता है, कोरोना वायरस की क्षमता में बदलाव किया जा सकता है, कोरोना वायरस का व्यवहार बदला जा सकता है, कोरोना वायरस का स्वभाव बदला जा सकता है। ये सब स्थिति और वातावरण के अनुसार कोरोना वायरस स्वयं भी कर सकता है, लेकिन कोरोना वायरस का समाप्त होना या कोरोना वायरस को समाप्त करना असंभव है।


भारतीय वैक्सीन असल में निष्क्रिय किये हुए कोरोना वायरस ही है। पागल कुत्ते के काटने पर जो रेबीज के टीके लगाए जाते हैं, वो रेबीज के टीके असल में रेबीज के ही निष्क्रिय वायरस होते हैं। वायरस निष्क्रिय होने के बाद किसी भी तरह से लाभ पहुँचाने या हानि पहुँचाने में असमर्थ हो जाते हैं।


दुनिया के अन्य देशों के लोगों का मालूम नहीं, लेकिन भारत के साधारण लोगों को जीवाणुओं के बारे में जानकारी नहीं होती या जानकारी बहुत कम होती है, लेकिन फिर भी अधिकांश पुराने लोग इतना तो जानते ही है कि दही खाने से क्या लाभ है ? कौनसे फल खाने से क्या लाभ है ? कौनसे फल कब खाने चाहिए और कब नहीं खाने चाहिए ?


उदाहरण के लिए कुछ बीमारियों में तली हुई चीज़े खाने से रोका जाता है, कुछ बीमारियों में खट्टी चीज़ों का सेवन नहीं करने से रोका जाता है, कुछ फल केवल अपने मौसम में ही लाभदायक होते है, कभी ठंडी चीज़ों का सेवन हानिकारक होता है, कभी ठंडी चीज़ों का सेवन लाभदायक होता है, कभी गर्म चीजों का सेवन हानिकारक होता है, कभी गर्म चीजों का सेवन लाभदायक होता है।


इस तरह पहले के साधारण लोग शरीर की अलग-अलग अवस्था में खान-पान का शरीर के ऊपर प्रभाव देखकर अनुमान लगा लेते थे कि स्वस्थ रहने और बीमारियों से बचने के लिए क्या करना चाहिए ? और किसी व्यक्ति के बीमार होने पर व्यक्ति के रोग की जाँच करके सामान्य बीमारियों का ईलाज घरेलू उपचार से कर दिया करते थे।


आजकल अधिकांश लोग बच्चों को या खुद को जरा-सी सर्दी-जुकाम होते ही तुरंत अस्पताल या मेडिकल स्टोर पर भागते हैं। आजकल अधिकांश घरों में सर्दी-जुकाम, बुखार, सिरदर्द, बदनदर्द, पेटदर्द, सिर चकराने इत्यादि की दवाईयाँ हमेशा उपलब्ध रहती है। केवल एक कप लौंग, इलायची, अदरक वगैरह डालकर बनाई हुई अच्छी-सी चाय पीने से ठीक होने वाली सर्दी-जुकाम के लिए भी अधिकांश लोग दवाई का सेवन करते हैं। केवल दो-चार घंटे आराम करने से ठीक होने वाले सिरदर्द या सिर चकराने की समस्या के लिए अधिकांश लोग दवाई का सेवन करके आराम करते हैं। असल में थकान या धूप वगैरह में घूमने के कारण होने वाला सिरदर्द या सिर चकराने की समस्या दवाई का सेवन किये बिना आराम करने से या कुछ ठंडा नींबू पानी, जूस वगैरह पीकर आराम करने से भी ठीक हो सकता है, लेकिन फिर भी अधिकांश लोग जान-बूझकर खुद को दवाईयों पर आश्रित कर रहे हैं।


अभी दुनियाभर के लोग कोरोना वायरस के कारण परेशान है। इस बार सबसे अधिक प्रभावित भारत ही है। कोरोना से संक्रमित होने वाले लोग तो परेशान है ही, लेकिन अन्य बीमारियों से पीड़ित लोग भी बहुत परेशानी झेल रहे हैं। इन परेशानी झेलने वालों में एक बड़ी संख्या सामान्य बीमारियों से परेशान लोगों की है। क्योंकि अधिकांश लोग बीमारी की जाँच करके सामान्य बीमारियों का घरेलू उपचार करना जानते नहीं है और किसी के घर में पुराने जानकार और अनुभवी लोग सामान्य बीमारियों के घरेलू उपचार करना जानते भी है, तो आजकल के लोगों ने अपने और अपने बच्चों के शरीर को दवाईयों पर आश्रित कर रखा है, इसलिए आजकल के लोग और बच्चे घरेलू उपचार से स्वस्थ होने में सक्षम नहीं है।


इस कोरोना काल में घरेलू उपचार से ठीक होने वाली सामान्य सर्दी-जुकाम, सामान्य सरदर्द, सामान्य सिर चकराने, सामान्य बुखार, सामान्य पेटदर्द इत्यादि जैसे रोगों की दवाईयाँ उपलब्ध नहीं होने या मँहगी मिलने के कारण दवाईयों के अभाव में ये सामान्य रोग कुछ समय बाद बड़े रोग बनकर लोगों को परेशान कर रहे हैं। इसका प्रमुख कारण अधिकांश लोगों का छोटी से छोटी समस्या के लिए दवाईयों पर आश्रित होना है।


हमें दवाईयों का अनावश्यक और अत्यधिक सेवन बन्द करके अपने शरीर को दवाईयों पर आश्रित होने से बचाने के लिए घरेलू उपचार की जानकार महिलाओं से, अच्छे और प्रशिक्षित वैद्यों से रोग की गंभीरता जाँचना और सामान्य रोग के घरेलू उपचार करना सीखने की आवश्यकता है। हमारा दिमाग और शरीर दैनिक जीवन के खान-पान की चीज़ों का आदि होता है, इसलिए अपने दैनिक जीवन के खान-पान से स्वस्थ होना भी सरल होता है और हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अर्थात इम्यूनिटी भी बढ़ती है। इसलिए सामान्य बीमारियों का ईलाज घरेलू उपचार से ही करना चाहिए और घरेलू उपचार से स्वस्थ होना संभव नहीं होने पर ही किसी प्रशिक्षित और योग्य डॉक्टर से अपना ईलाज करवाना चाहिए।


सभी तरह की चिकित्सा पद्धति के प्रशिक्षित और योग्य डॉक्टर्स, प्रशिक्षित और योग्य वैद्य और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े प्रशिक्षित और योग्य लोगों को इन तथ्यों के बारे में पूर्ण जानकारी होती है, इसलिए प्रशिक्षित और योग्य डॉक्टर्स, वैद्य और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग कभी-भी यह दावा नहीं करेंगे कि हर बीमारी का ईलाज केवल एक ही चिकित्सा पद्धति में है या किसी एक चिकित्सा पद्धति से सभी बीमारियों का ईलाज किया जा सकता है। हर व्यक्ति का ईलाज व्यक्ति की आयु, व्यक्ति के Gender, व्यक्ति की मानसिक स्थिति, व्यक्ति की शारीरिक स्थिति इत्यादि के अनुसार होता है।


यहाँ मेरे शब्दों "प्रशिक्षित और योग्य" पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। हम बीमार होने पर किसी भी चिकित्सा पद्धति के डॉक्टर, वैद्य या चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े किसी अन्य व्यक्ति से अपना ईलाज करवाए, लेकिन उन डॉक्टर, वैद्य या चिकित्सा क्षेत्र के व्यक्ति का प्रशिक्षित और योग्य होना सबसे अधिक आवश्यक है।


अब उन डॉक्टर, वैद्य या चिकित्सा क्षेत्र के व्यक्ति के "प्रशिक्षित और योग्य" होने का आंकलन कैसे और किस आधार पर करना है ? यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है। क्योंकि स्वयं को प्रशिक्षित प्रमाणित करने के लिए डिग्री तो लगभग सभी के पास होती है और कोई भी डॉक्टर, वैद्य या चिकित्सा क्षेत्र का व्यक्ति खुद को अयोग्य नहीं कहेगा।


दुनिया के बुद्धिमान से बुद्धिमान लोग भी किसी व्यक्ति के प्रशिक्षित और योग्य होने का आंकलन करना नहीं सीखा सकते। क्योंकि कोई भी बात हमेशा सही या हमेशा गलत नहीं होती और कोई भी बात सभी के ऊपर समान रूप से लागू नहीं होती। इसलिए किसी के प्रशिक्षित और योग्य होने का आंकलन केवल और केवल स्वयं के विवेक से ही किया जा सकता है।


अपने लिए डॉक्टर का चयन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि डॉक्टर के प्रशिक्षित और योग्य होने का आंकलन डॉक्टर की आयु, डॉक्टर की डिग्रियों और डॉक्टर के बड़े नाम के आधार पर नहीं करना चाहिए। क्योंकि बहुत से डॉक्टर जनसेवा के उद्देश्य से लोगों का ईलाज करके ईमानदारी से धन कमाते हैं और बहुत से डॉक्टर अनुचित तरीके से धन कमाने के लिए गर्भवती महिलाओं के साधारण डिलीवरी केस में भी ऑपरेशन करवाने को बोल देते हैं। बहुत से युवा डॉक्टर धन कमाने की ओर कम ध्यान देते हैं और लोगों को स्वस्थ करने की ओर अधिक ध्यान देते हैं, इसके विपरीत बहुत से 50-60 वर्ष से अधिक आयु वाले डॉक्टर केवल धन कमाने पर ही अधिक ध्यान देते हैं। इसलिए कभी-भी डॉक्टर की आयु, डॉक्टर की डिग्रियों और डॉक्टर के बड़े नाम के आधार पर डॉक्टर के प्रशिक्षित और योग्य होने का आंकलन नहीं करना चाहिए।


कोई भी अच्छा और योग्य डॉक्टर हमें दवाईयों का अनावश्यक और अत्यधिक सेवन करने के सुझाव कभी नहीं देगा। सभी अच्छे प्रशिक्षित और योग्य डॉक्टर्स दवाईयों का अनावश्यक और अत्यधिक सेवन करने से रोकते ही हैं, ताकि हमारे शरीर के भीतर हमारे लिए लाभदायक जीवाणुओं की संख्या अधिक से अधिक हो और हम कम से कम बीमार हो। और अगर बीमार हो भी जाए, तो हमें दवाईयों का सेवन कम से कम करना पड़े। सभी अच्छे प्रशिक्षित और योग्य डॉक्टर्स यहीं चाहते हैं।

..............................#Varman_Garhwal

09-05-2021, #वर्मन_गढ़वाल

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Tuesday, November 10, 2020

डॉक्टर जाकिर हुसैन - अब्बू खाँ की बकरी चाँदनी

 कहानी - अब्बू खाँ की बकरी चाँदनी

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हिमालय पहाड़ पर अल्मोड़ा नाम की एक बस्ती है। उसमें एक बड़े मियाँ रहते थे। उनका नाम था अब्बू खाँ। उन्हें बकरियाँ पालने का बड़ा शौक था। बस एक दो बकरियाँ रखते, दिन भर उन्हें चराते फिरते और शाम को घर में लाकर बाँध देते। अब्बू गरीब थे और भाग्य भी उनका साथ नहीं देता था। उनकी बकरियाँ कभी-न-कभी रस्सी तुड़ाकर भाग जाती थीं। पहाड़ पर एक भेड़िया रहता था। वह उन्हें खा जाता था। मगर अजीब बात है कि न अब्बू खाँ का प्यार, न शाम के दाने का लालच और न भेड़िये का डर उन्हें भागने से रोकता। हो सकता है, ये पहाड़ी जानवर अपनी आजादी से इतना अधिक प्यार करते हों कि उसे किसी कीमत पर बेचने के लिए तैयार न हों।



जब भी कोई बकरी भाग जाती, अब्बू खाँ बेचारे सिर पकड़कर बैठ जाते। हर बार यही सोचते कि अब से बकरी नहीं पालूँगा। मगर अकेलापन बुरी चीज है। थोड़े दिन तक तो वे बिना बकरियों के रह लेते, फिर कहीं से एक बकरी खरीद लाते।



इस बार वे जो बकरी खरीद कर लाए थे, वह बहुत सुंदर थी। उसके बाल सफेद थे। काले-काले सींग भी बड़े खूबसूरत थे। सीधी इतनी थी कि चाहे तो कोई बच्चा दुह ले। अब्बू खाँ इस बकरी को बहुत चाहते थे। उसका नाम उन्होंने चाँदनी रखा था। दिन भर उस से बातें करते रहते।



अपनी इस नई बकरी के लिए उन्होंने एक नया इंतजाम किया। घर के बाहर उनका एक छोटा-सा खेत था। उसके चारों ओर उन्होंने बाड़ बँधवाई। इसके बीच में वे चाँदनी को बाँधते थे। रस्सी इतनी लंबी रखते थे कि वह खूब इधर-उधर घूम सके। इस तरह बहुत दिन बीत गए। अब्बू खाँ को विश्वास हो गया कि चाँदनी कहीं नहीं जा सकती।



मगर अब्बू खाँ धोखे में थे। आजादी की इच्छा इतनी आसानी से किसी के मन से नहीं जाती। चाँदनी पहाड़ की खुली हवा को भूल नहीं पाई थी। एक दिन चाँदनी ने पहाड़ की ओर देखा। उसने मन-ही-मन सोचा, वहाँ की हवा और यहाँ की हवा का क्या मुकाबला? फिर वहाँ उछलना, कूदना, ठोकरें खाना और यहाँ हर वक्त बँधे रहना। मन में इस विचार के आने के बाद चाँदनी अब पहले जैसी न रही। वह दिन-पर-दिन दुबली होने लगी। न उसे हरी घास अच्छी लगती और न पानी मजा देता। अजीब-सी दर्द भरी आवाज में वह ‘में-में’ चिल्लाती।



अब्बू खाँ समझ गए कि हो-न-हो कोई बात जरूर है, लेकिन उनकी समझ में न आता था कि बात क्या है? एक दिन अब्बू खाँ ने दूध दुह लिया, तो चाँदनी उदास भाव से उनकी ओर देखने लगी। मानो कह रही हो, “बड़े मियाँ, अब तुम्हारे पास रहूँगी तो बीमार हो जाऊँगी। मुझे तो तुम पहाड़ में जाने दो।”



अब्बू खाँ मानो उसकी बात समझ गए। चिल्लाकर बोले, “या अल्लाह! यह भी जाने को कहती है।“ वे सोचने लगे, “अगर यह पहाड़ पर चली गई, तो भेड़िया इसे भी खा जाएगा। पहले भी वह कई बकरियाँ खा चुका है।” उन्हें चाँदनी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। उन्होंने तय किया कि चाहे जो हो जाए, वे चाँदनी को पहाड़ पर नहीं जाने देंगे। उसे भेड़िये से जरूर बचायेंगे।



अब्बू खाँ ने चाँदनी को एक कोठरी में बंद कर दिया। ऊपर से साँकल चढ़ा दी। मगर गुस्से और झुंझलाहट में वे कोठरी की खिड़की बंद करना भूल गए। इधर उन्होंने कुंडी चढ़ाई और उधर चाँदनी उचक कर खिड़की से बाहर।



चाँदनी पहाड़ पर पहुँची, तो उसकी खुशी का क्या पूछना! पहाड़ पर पेड़ उसने पहले भी देखे थे, लेकिन आज उनका रंग और ही था। चाँदनी कभी इधर उछलती, कभी उधर। यहाँ कूदी, वहाँ फाँदी, कभी चट्टान पर है, तो कभी खड्डे में। इधर जरा फिसली, फिर संभली। एक चाँदनी के आने से पहाड़ में रौनक आ गई थी।



दोपहर तक वह इतनी उछली-कूदी कि शायद सारी उम्र में इतनी न उछली कूदी होगी। दोपहर ढले उसे पहाड़ी बकरियों का एक झुंड दिखाई दिया। थोड़ी देर तक वह उनके साथ रही। दोपहर बाद जब बकरियों का झुंड जाने लगा, तब वह उनके साथ नहीं गई। उसे आजादी इतनी प्यारी थी कि वह किसी के बंधन में पड़ना ही नहीं चाहती थी।



शाम का वक्त हुआ। ठंडी हवा चलने लगी। सारा पहाड़ लाल हो गया। चाँदनी पहाड़ से अब्बू खाँ के घर की ओर देख रही थी। धीरे-धीरे अब्बू खाँ का घर और काँटे वाला घेरा रात के अँधेरे में छिप रहा था।



रात का अँधेरा गहरा था। पहाड़ में एक तरफ आवाज आई-‘खूँ-खूँ’। यह आवाज सुनकर चाँदनी को भेड़िये का ख्याल आया। दिन भर में एक बार भी उसका ध्यान उधर न गया था। पहाड़ के नीचे सीटी और बिगुल की आवाज आई। वह बेचारे अब्बू खाँ थे। वे कोशिश कर रहे थे कि सीटी और बिगुल की आवाज सुनकर चाँदनी शायद लौट आए। उधर से दुश्मन भेड़िये की आवाज आ रही थी।



चाँदनी के मन में आया कि लौट चले। लेकिन उसे खूंटा याद आया। रस्सी याद आई। काँटों का घेरा याद आया। उसने सोचा कि इससे तो मौत अच्छी। आखिर सीटी और बिगुल की आवाज बंद हो गई। पीछे से पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई दी। चाँदनी ने मुड़कर देखा, तो दो कान दिखाई दिए, सीधे और खड़े हुए और दो आँखें, जो अँधेरे में चमक रही थीं। भेड़िया पहुँच गया था।



भेड़िया जमीन पर बैठा था। उसकी नजर बेचारी बकरी पर जमी हुई थी। उसे जल्दी न थी। वह जानता था कि बकरी कहीं नहीं जा सकती। वह अपनी लाल-लाल जीभ अपने नीले-नीले होंठों पर फेर रहा था।



पहले तो चाँदनी ने सोचा कि क्या लड़ूँ। भेड़िया बहुत ताकतवर है। उसके पास नुकीले बड़े-बड़े दाँत हैं। जीत तो उसकी ही होगी। लेकिन फिर उसने सोचा कि यह तो कायरता होगी। उसने सिर झुकाया। सींग आगे को किए और पैंतरा बदला। वह भेड़िये से लड़ गई। लड़ती रही। कोई न समझे कि चाँदनी भेड़िये की ताकत को नहीं जानती थी। वह खूब समझती थी कि बकरियाँ भेड़िये को नहीं मार सकती। लेकिन मुकाबला जरूरी है। बिना लड़े हार मानना कायरता है।



चाँदनी ने भेड़िये पर एक के बाद एक हमला किया। भेड़िया भी चकरा गया। लेकिन भेड़िया था। सारी रात गुजार गई। धीरे-धीरे चाँदनी की ताकत ने जवाब दे दिया, फिर भी उसने दुगना जोर लगाकर हमला किया। लेकिन भेड़िये के सामने उसका कोई बस नहीं चला। वह बेदम होकर जमीन पर गिर पड़ी। पास ही पेड़ पर बैठी चिड़ियाँ इस लड़ाई को देख रही थीं। उनमें बहस हो रही थी कि कौन जीता। बहुत सी चिड़ियों ने कहा, ‘भेड़िया जीता।’ पर एक बूढ़ी चिड़िया बोली, ‘चाँदनी जीती’।

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समाप्त

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लेखक - डॉक्टर जाकिर हुसैन

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इस कहानी से हमें निम्नलिखित बातें सीखने को मिलती है :-


1. हमें नासमझ अपनों अर्थात छोटे बच्चों की देखभाल में कभी लापरवाही नहीं करनी चाहिए।


जैसे अब्बू खाँ से एक खिड़की खुली रह गई। क्योंकि बच्चों को क्या पता ? साँप-बिच्छु के काटने से मृत्यु हो सकती है ? कौनसा कुत्ता काट सकता है और कौनसा कुत्ता नहीं काटेगा ? बच्चों के लिए तो सभी कुत्ते एक जैसे हैं।


2. हमें अपनों पर आवश्यकता से अधिक रोक-टोक नहीं लगानी चाहिए। आवश्यकता से अधिक रोक-टोक कैद जैसी लगने लगती है और कैद आखिर कैद ही होती है। पिंजरा चाहें सोने का हो, लेकिन कोई भी पिंजरे में नहीं रहना चाहता।


चाँदनी की तरह लड़के-लड़कियाँ घरवालों की अत्यधिक कठोरता के कारण घर से भाग जाते हैं।


जैसे अब्बू खाँ शाम के समय सीटी और बिगुल बजाते हैं कि सीटी और बिगुल की आवाज सुनकर शायद चाँदनी लौट आएँ।


इसी प्रकार घरवाले विज्ञापन वगैरह देते हैं, लेकिन बच्चे घरवालों की अत्यधिक कठोरता या अत्यधिक रोक-टोक को याद करके चाँदनी की तरह वापस नहीं आते।


उदाहरण के लिए यदि अब्बू खाँ खुद ही हर रोज़ घंटेभर के लिए चाँदनी को पहाड़ पर घूमा लाते, तो संभवतः चाँदनी अकेली पहाड़ पर जाने के लिए इतनी लालायित नहीं होती। और चली भी जाती, तो अब्बू खाँ के प्रेम को याद करके सीटी और बिगुल की आवाज सुनकर लौट आती।


3. हमें अपनों पर रोक-टोक लगाने की बजाय अपनों को समझाने का प्रयास करना चाहिए।


उदाहरण के लिए माता-पिता अक्सर अपने छोटे बच्चों को अन्जान लोगों के साथ बात करने से मना करते हैं, अन्जान लोगों से खाने-पीने की चीज़े लेने से मना करते हैं। क्योंकि छोटे बच्चों का अपहरण होता रहता है।


मेरे विचार से बच्चों को स्पष्ट समझाना चाहिए कि कई घटिया लोग बच्चों का अपहरण करके ले जाते हैं और बच्चों को मारते-पीटते हैं, भूखा रखते हैं, बहुत बुरा व्यवहार करते हैं।


इसी प्रकार छोटे बच्चों को यौन अपराधों के प्रति भी सचेत कर देना चाहिए कि कोई तुम्हें यहाँ हाथ लगाएँ, तो बता देना। ऐसी-ऐसी हरकतें करने वाले लोग गन्दे होते हैं और बच्चों को मार देते हैं।


ये बात लड़के-लड़कियों दोनों के लिए हैं। क्योंकि कई नीच प्रवृत्ति के हवसी छोटे लड़कों के साथ भी गुदा मैथुन जैसे अपराध करते हैं। 8-10 वर्ष की आयु तक के बच्चों को इतना समझाना पर्याप्त है। इसमें कोई अश्लीलता या कुछ आपत्तिजनक नहीं है। जान है, तो जहाँन है।


4. हमसे प्रेम करने वाले गलत हो सकते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य हमारे साथ बुरा करना नहीं हो सकता। इसलिए हमें विचार करना चाहिए कि हमसे प्रेम करने वाले हमारे साथ बुरा क्यों कर रहे हैं ?


हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि महिलाएँ केवल उन पुरुषों को समझती हैं, जिन पुरुषों के साथ महिलाएँ भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई हो। जैसे कि पिता, भाई, दोस्त, पति, बेटा वगैरह-वगैरह।


इसी प्रकार पुरुष केवल उन महिलाओं को समझते हैं, जिन महिलाओं के साथ पुरुष भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हो। जैसे कि माता, बहन, सहेली, पत्नी, बेटी वगैरह-वगैरह।


ये कहना सरासर मूर्खता है कि महिला किसी भी पुरुष के छल-कपट को समझ सकती है या पुरुष किसी भी महिला के छल-कपट को समझ सकते हैं।


इसलिए पुरुषों के बारे में अपने घर के पुरुषों और अपने निकटतम मित्र पुरुषों से सुझाव लेना चाहिए और महिलाओं के बारे में अपने घर की महिलाओं और अपनी निकटतम मित्र महिलाओं से सुझाव लेना चाहिए। क्योंकि महिलाओं को महिलाएँ अधिक समझती हैं और पुरुषों को पुरुष ही अधिक समझते हैं।


5. हमें अपनों अर्थात अपने घर-परिवार और मित्र समूह अर्थात हम जिनको भली-भांति जानते और समझते हैं, उनके साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए। लड़के तो अपने मित्र समूह के साथ मोस्टली मिल-जुलकर रहते हैं, लेकिन लड़कियों में लड़कियों के साथ मिल-जुलकर रहने का अभाव है, इसीलिए लड़कियों के साथ अपराध अधिक होते हैं।


अगर चाँदनी अकेली रहने की बजाय बकरियों के झुंड के साथ चली जाती, तो बच जाती। और भेड़िया झुंड पर हमला करता, तो सभी बकरियाँ मिलकर भेड़िये का मुकाबला करने में भी सक्षम थी। इसलिए हमें हमेशा अपने घर-परिवार और मित्र-समूह के साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए।


6. और अंत में सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि यदि किसी कारण हम संकट में फँस जाएँ, तो संकट चाहें कितना भी बड़ा हो ? चाहें हमारी मृत्यु या बलात्कार तय हो ? हमें किसी भी परिस्थिति में घूटने नहीं टेकने चाहिए।


पहले तो स्वयं पर संयम रखते हुए बुद्धिमानी से सुरक्षित निकलने का प्रयास करो, लेकिन यदि सुरक्षित निकलने का कोई रास्ता नहीं है, तो फिर लड़कर मरो।


क्योंकि जब शिकार होना या मरना ही है, तो शिकार होने या मरने से पहले बचने का एक अंतिम प्रयास अवश्य करना चाहिए।

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लेखक - वर्मन गढ़वाल

Tuesday, June 16, 2020

मानसिक तनाव या डिप्रेशन

पहले मेरे पिताजी ने हनुमानगढ़ में हमारे घर पर ही किरयाना की दुकान खोल रखी थी। 2004-05 से पहले हमारी दुकान अच्छी चलती थी, इसलिए पिताजी क्वांटिटी में सामान लाते थे।

आजकल 50 किलोग्राम चीनी के कट्टे आते हैं, लेकिन उस समय एक क्विंटल अर्थात 100 किलोग्राम की चीनी से भरी बोरी आती थी। मेरे पिताजी चीनी से भरी चार-पाँच बोरी एक साथ खच्चर गाड़ी पर लाते थे। खच्चर गाड़ी लगभग घोड़े जैसा पशु है। दिखने में बिल्कुल घोड़ा ही लगता है। जैसे ऊँटगाड़ी और बैलगाड़ी होती है, वैसे ही खच्चर गाड़ी होती है।

उस समय आयु में 20 वर्ष से लेकर 50 वर्ष तक के लोग खच्चर गाड़ी चलाया करते थे। मेरे पिताजी उनमें से किसी एक खच्चर गाड़ी वाले से बात कर लेते थे।

खच्चर गाड़ी वाला एक क्विंटल चीनी से भरी बोरियाँ, 50 किलोग्राम चावल से भरे बोरे इत्यादि अकैले ही हँसते-मुस्कुराते हुए बाज़ार में दुकानों से उठाकर खच्चर गाड़ी में और हमारे घर आकर खच्चर गाड़ी से पीठ पर लादकर बड़े आराम से हमारे घर के अन्दर रख देता था।

मेरे पिताजी बचपन से बीमार रहे हैं, इसलिए पिताजी एक क्विंटल चीनी की बोरी अकेले हिला भी नहीं सकते।

मेरी मम्मी बीमार होने से पहले 42-43 वर्ष की आयु होने तक 40 से 50 किलो वजन सर पर उठाकर बड़े आराम से आधा किलोमीटर पैदल चल लेती थी।

मेरी मम्मी बताती है कि मेरी बड़ी मामी और छोटी मामी पहले डेढ़ मन अर्थात 60 किलोग्राम वजन सर पर उठाकर खेत से लगभग ढ़ाई किलोमीटर बड़े आराम से पैदल चलकर घर आती थी।

मैं पहले 25-30 किलोग्राम वजन उठाकर थोड़ा-बहुत चल लेता था, लेकिन अभी 20 किलोग्राम वजन उठाकर मैं 20 मीटर पैदल नहीं चल सकता।

यहाँ कहने का अभिप्राय यह है कि सभी लोगों की क्षमता अलग-अलग होती है। एक व्यक्ति एक क्विंटल चीनी से भरी बोरी बड़े आराम से उठा लेता है, लेकिन दूसरा व्यक्ति के लिए अकेले उस बोरी को हिलाना भी संभव नहीं है। कुछ महिलाएँ 60 किलोग्राम वजन सर पर उठाकर बड़े आराम से चल लेती है, कुछ महिलाएँ केवल 40-50 किलोग्राम वजन उठाकर चल पाती है और मेरे जैसे लोगों के लिए 20 किलोग्राम वजन उठाकर चलना भी मुश्किल होता है।

इसी प्रकार सभी लोगों में मानसिक तनाव का सामना करने की क्षमता भी अलग-अलग होती है। हमने सफलतापूर्वक मानसिक तनाव का सामना कर लिया, इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी लोगों की मानसिक क्षमता हमारे जैसी ही है। हम किसी तरह जीवित बच गए, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मरने वाले कायर और डरपोक है।

कुछ दिन पहले मैंने असफल होने के कारण आत्महत्या करने वालों पर एक पोस्ट किया था कि असफल होने पर आत्महत्या करने का मूल कारण लोगों का असफल व्यक्ति को असफलता के कारण अपमानित करना और मज़ाक उड़ाना है।

इसका उपाय यह है कि व्यक्ति को बचपन से ही असफलता का सामना करने के लिए तैयार रहना सिखाना चाहिए। उदाहरण के लिए पढ़ाई में गंभीर और मेहनती बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि असफल होने पर असफल व्यक्ति के साथ क्या-क्या नकारात्मक होता है ? इस नकारात्मक वातावरण और इन नकारात्मक लोगों का सामना कैसे करना है ? बच्चे को ये समझाना अतिआवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में सफलता को कन्फर्म नहीं मानना चाहिए और असफलता सामान्य बात है।

इसी प्रकार किसी अपने को खोने के कारण तनावग्रस्त होने वाले व्यक्ति को छोटे बच्चों के बीच ले जाने से हँसते-खिलखिलाते बच्चे देखकर व्यक्ति का मानसिक तनाव कम होता है। क्योंकि छोटे बच्चे समझदार लोगों की तरह कुछ समझाने का प्रयास तो करते नहीं है। इसलिए किसी अपने को खोने वाला व्यक्ति छोटे बच्चों की निःस्वार्थ भावनाओं में अपनापन महसूस करता है और व्यक्ति के मन में जीने की इच्छा जागृत होती है।

यदि कोई व्यक्ति कारोबार में घाटा होने या नौकरी जाने या काम-धंधा ना मिलने के कारण मानसिक अवसाद का शिकार होता है, तो उसे सहयोग की आवश्यकता होती है। अब कोई किसी का मानसिक तनाव ठीक करने के लिए अपना धन तो देगा नहीं, इसलिए ऐसे व्यक्ति को असफलता के कारण बताने की बजाय पुनः नई शुरुआत करने के लिए प्रेरित करके कोई नौकरी या कोई काम दिलवाने में सहयोग करना चाहिए।

इसमें अधिक अमीर लोगों के साथ यह समस्या रहती है कि कोई नौकरी या छोटी नौकरी या छोटा काम करने पर आस-पास के लोग उनकी असफलता याद दिलाकर उनको अपमानित करते रहते हैं।

किसी तरह का झूठा आरोप लगने या किसी अन्य कारण से इज्ज़त खराब होने पर तनावग्रस्त होने वाले व्यक्ति को भी ताने मारकर और मज़ाक उड़ाकर अपमानित करने वालों से दूर रखना चाहिए।

हमें यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति का जीवन अलग होता है। हर व्यक्ति के जीवन में परेशानियाँ और मुसीबतें अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के जीवन में आस-पास का वातावरण और परिस्थितियाँ अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के जीवन में घर-परिवार के सदस्य, आस-पड़ोस के लोग, दोस्त, रिश्तेदार, मिलने-जुलने वाले सभी लोग भी अलग-अलग तरह के होते हैं। इन सभी बातों का व्यक्ति मानसिक स्थिति पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

इस तरह हम अलग-अलग केस में पहले अच्छी तरह पूरा मामला और सभी तरह की परिस्थितियों को समझकर व्यक्ति को मानसिक तनाव का शिकार होने से बचाने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन व्यक्ति के आस-पास वाले ढ़ेर सारे लोगों को कैसे समझाएं ?

इसलिए सबसे अच्छा यहीं है कि मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को नकारात्मक बातें करने वालों से, किसी भी तरह की गन्दी बातें करने वालों से, मज़ाक उड़ाने वालों से, ताने मारने वालों से, अपमानित करने वालों से दूर रखना चाहिए।

मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या यहीं है कि वो अकेले कुछ नहीं कर सकता। अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को अकेला छोड़ दिया, तब तो उसकी आत्महत्या लगभग तय है।

अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के आस-पास का वातावरण और आस-पास के लोग अच्छे नहीं होंगे, तो व्यक्ति को लगेगा कि इस बेकार दुनिया में जीने की बजाय मरना ही उचित है। इसलिए किसी आत्महत्या करने वाले को कायर और डरपोक कहने की बजाय आत्महत्या के कारण और परिस्थितियों को समझकर अपने आस-पास ध्यान रखना चाहिए कि हमारे आस-पास कोई व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार तो नहीं है ? और यदि है, तो ये मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को आत्महत्या से रोकने के लिए ये अस्थायी उपाय किये जा सकते हैं।

अब मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को खराब वातावरण और नकारात्मक लोगों से दूर कैसे रखना है ? अच्छे वातावरण और अच्छे लोगों के बीच कैसे ले जाना है ? यह मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के निकटतम लोगों की जिम्मेदारी बनती है।

सबसे पहले तो यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। किसी ना किसी को हमेशा मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के आस-पास रहकर व्यक्ति पर नज़र रखनी चाहिए और समय-समय पर व्यक्ति के साथ बातचीत जारी रखनी चाहिए। वरना मानसिक तनाव का शिकार व्यक्ति कुछ ना कुछ सोचता रहता है और अवसर मिलते ही आत्महत्या का प्रयास करता है।

अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ लगातार बातचीत करते रहेंगे, तो व्यक्ति का ध्यान बातचीत में रहेगा और व्यक्ति के दिमाग में अधिक से अधिक विचार बातचीत संबंधी आएँगे। इससे व्यक्ति सोच-विचार नहीं कर पाएँगा और सोच-विचार नहीं करेगा, तो आत्महत्या के बारे में भी नहीं सोचेगा।

मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ बातचीत करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को कुछ समझाने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।

अधिकांश लोग मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को समझाने का प्रयास करके सबसे बड़ी गलती करते हैं। क्योंकि लोग जो समझाते हैं, मानसिक तनाव का शिकार व्यक्ति वो सब पहले ही बहुत अच्छी तरह बारीकी से सोच चुका होता है।

इसलिए मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ

"उस लड़की/लड़के को भूल जा"

"माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी, बच्चों के बारे में सोचो।"

सफल लोगों के किस्से-कहानियाँ सुनाने और जीवन में आगे क्या करना चाहिए ?

जैसी बातें बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए।

इस तरह की बातों से मानसिक तनाव बढ़ जाता है। क्योंकि व्यक्ति पहले से ही ये सब सोच चुका होता है, इसलिए लोग अन्जाने में बार-बार इन बातों को दोहराकर व्यक्ति के आत्महत्या के निर्णय को याद दिलाते रहते हैं और व्यक्ति के आत्महत्या करने का निर्णय धीरे-धीरे अधिक मजबूत हो जाता है।

कोई भी व्यक्ति किसी को अपना मानने के बाद कभी भूलता नहीं है, इसलिए यदि किसी अपने की मृत्यु के कारण व्यक्ति तनावग्रस्त है, तो कहना चाहिए कि मिलना-बिछड़ना और जीवन-मृत्यु जीवन का हिस्सा है। अब इस सच्चाई के साथ जीना है, इसलिए इसे स्वीकार करो।

यदि बेवफाई जैसा कोई मसला हो, तो कहना चाहिए कि तुम उसकी खुश देखना चाहते हो या उसको दुःखी करके अपने साथ देखना चाहते हो ? वो तुम्हारे साथ खुश नहीं थी/था। तुम्हें छोड़कर वो खुश है। तुम उससे प्यार करते हो, तो उसे खुश देखकर मर क्यों रहे हो ?

अगर सच्चा प्रेमी हुआ या सच्ची प्रेमिका हुई, तो ये बात समझाने के बाद आत्महत्या का नाम भी याद नहीं रहेगा।

इसके अलावा आत्महत्या का कोई अन्य कारण हो, तो मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति से कोई ना कोई छोटी-मोटी सहायता मांगते रहना चाहिए।

जैसे कि मम्मी-पापा ये बात नहीं मान रहे, मम्मी-पापा को कैसे मनाऊँ ? भाई-बहन नाराज़ हो गये, कैसे मनाऊँ ? नाराज़ गर्लफ्रैंड को कैसे मनाऊँ ? नाराज़ बॉयफ्रैंड को कैसे मनाऊँ ? और कुछ नहीं तो मेरी कोई गर्लफ्रैंड नहीं है, गर्लफ्रैंड कैसे मनाऊँ ? अपने कारोबार या नौकरी की कोई प्रोब्लम बताकर सोल्यूशन पूछ सकते हैं ? इस तरह की कोई भी इधर-उधर की बातें बताकर कुछ ना कुछ पूछते रहने से व्यक्ति का ध्यान इन बातों में लगा रहता है और व्यक्ति का मानसिक तनाव धीरे-धीरे कम  होने लगता है।

यहाँ एक और आवश्यक बात जान लीजिए कि मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या का निर्णय करने वाला व्यक्ति धर्म-मज़हब, जाँत-पाँत, अमीरी-गरीबी, नारी-पुरुष, फलाना-ढ़िमका जैसे सभी भेदभाव से मुक्त हो जाता है। क्योंकि उसे तो मरना होता है, इसलिए ये सब उसके किस काम के ? इसलिए अगर आपकी भावनाएँ सच्ची हो, तो मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या का निर्णय करने वाला व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से आपकी सहायता करने का हरसंभव प्रयास करता है। कम से कम जब तक व्यक्ति के दिमाग में आत्महत्या का निर्णय होता है, तब तक व्यक्ति पूर्णतया निःस्वार्थ होता है।

इस तरह मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है। यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखिए कि ऊपर बताएँ गये तरीके केवल अस्थायी उपाय है। अर्थात व्यक्ति का मानसिक तनाव कुछ समय के लिए कम हो जाता है, लेकिन किसी विपरीत परिस्थिति में मानसिक तनाव दूबारा भी हो सकता है।

उदाहरण के लिए किसी लड़के की प्रेमिका का देहांत हो गया। लड़के का मानसिक तनाव कम करने के लिए लड़के को एक-डेढ़ महीने के लिए किसी रिश्तेदार के यहाँ, जिसके घर में छोटे बच्चे हो। या किसी अन्य जगह जहाँ कुछ छोटे बच्चे हर रोज लड़के से मिलते-जुलते रहें। वहाँ भेज दिया।

लड़का बच्चों के बीच रहकर ठीक हो सकता है, लेकिन लड़का जब वापस पुराने वातावरण में, पुराने लोगों के बीच आएँगा, तो फिर से सब याद आने और सारी दुःखी करने वाली बातें दिमाग में घूमने से दूबारा समस्या हो सकती है। इसलिए ये केवल अस्थायी उपाय होता है।

आत्महत्या रोकने के लिए स्थायी उपाय लगभग असंभव है, लेकिन फिर अपने आस-पास सकारात्मक वातावरण बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

जहाँ असफल लोगों को अपमानित किये बिना पुनः प्रयास करने या किसी अन्य क्षेत्र में सफल होने के लिए प्रेरित किया जाएँ। सब लोग ना सुधरे, लेकिन कुछ लोग ऐसे हो, जिससे व्यक्ति को विश्वास रहें कि असफलता के कारण मेरा अपमान नहीं होगा।

जहाँ प्यार का अर्थ एक-दूसरे पर नियंत्रण करने की बजाय एक-दूसरे को खुश रखना और आवश्यकता पड़ने पर कभी भी अलग होने की आजादी देना हो। इससे ब्रेकअप, धोखे और डिवॉर्स के कारण होने वाली आत्महत्याएँ बहुत कम हो जाएँगी।

जहाँ आरोप साबित होने से पहले व्यक्ति को अपराधी ना माना जाएँ।

जहाँ कोई फैसला बच्चे और माता-पिता मिल-जुलकर करते हो।

जहाँ बच्चों के अपनी इच्छा से विवाह करने पर माता-पिता को अपमानित ना किया जाएँ।

इस तरह आत्महत्याओं के सभी तरह के कारणों और सभी तरह की परिस्थितियों पर विचार करके अपने आस-पास अच्छा और सकारात्मक वातावरण बनाना आत्महत्याएँ रोकने का स्थायी उपाय है। आत्महत्या करने वालों को कोसने और आत्महत्याओं पर दुःख व्यक्त करने से ना तो आज तक कोई आत्महत्या रूकी है और ना ही कभी कोई आत्महत्या रूकेगी। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप केवल कोसने या दुःख व्यक्त करने की औपचारिकताएँ निभाते रहना चाहते हैं या फिर आत्महत्याओं को रोकना चाहते हैं ?
~~~~~~~~~~#Varman_Garhwal
14-06-2020, #वर्मन_गढ़वाल
Last Time - 1976
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विशेष ध्यान देने योग्य स्पेशल नोट :- मैंने इस पोस्ट में एक शब्द "मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति" का उपयोग किया है।

मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या और मानसिक तनाव के कारण अपने साथ-साथ दूसरों को नुकसान पहुँचाना पूरी तरह अलग-अलग विषय है।  इसके अलावा क्षणिक आवेग के कारण आत्महत्या भी पूरी तरह अलग विषय है।

अतः इस बात का विशेष ध्यान रखिए कि ये पोस्ट केवल मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या करने वालों को ध्यान में रखकर लिखी है।

मानसिक तनाव के कारण खुद के साथ-साथ दूसरों को नुकसान पहुँचाना और क्षणिक आवेग के कारण आत्महत्या करना पूर्णतया अलग मामला है।