Tuesday, November 10, 2020

डॉक्टर जाकिर हुसैन - अब्बू खाँ की बकरी चाँदनी

 कहानी - अब्बू खाँ की बकरी चाँदनी

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हिमालय पहाड़ पर अल्मोड़ा नाम की एक बस्ती है। उसमें एक बड़े मियाँ रहते थे। उनका नाम था अब्बू खाँ। उन्हें बकरियाँ पालने का बड़ा शौक था। बस एक दो बकरियाँ रखते, दिन भर उन्हें चराते फिरते और शाम को घर में लाकर बाँध देते। अब्बू गरीब थे और भाग्य भी उनका साथ नहीं देता था। उनकी बकरियाँ कभी-न-कभी रस्सी तुड़ाकर भाग जाती थीं। पहाड़ पर एक भेड़िया रहता था। वह उन्हें खा जाता था। मगर अजीब बात है कि न अब्बू खाँ का प्यार, न शाम के दाने का लालच और न भेड़िये का डर उन्हें भागने से रोकता। हो सकता है, ये पहाड़ी जानवर अपनी आजादी से इतना अधिक प्यार करते हों कि उसे किसी कीमत पर बेचने के लिए तैयार न हों।



जब भी कोई बकरी भाग जाती, अब्बू खाँ बेचारे सिर पकड़कर बैठ जाते। हर बार यही सोचते कि अब से बकरी नहीं पालूँगा। मगर अकेलापन बुरी चीज है। थोड़े दिन तक तो वे बिना बकरियों के रह लेते, फिर कहीं से एक बकरी खरीद लाते।



इस बार वे जो बकरी खरीद कर लाए थे, वह बहुत सुंदर थी। उसके बाल सफेद थे। काले-काले सींग भी बड़े खूबसूरत थे। सीधी इतनी थी कि चाहे तो कोई बच्चा दुह ले। अब्बू खाँ इस बकरी को बहुत चाहते थे। उसका नाम उन्होंने चाँदनी रखा था। दिन भर उस से बातें करते रहते।



अपनी इस नई बकरी के लिए उन्होंने एक नया इंतजाम किया। घर के बाहर उनका एक छोटा-सा खेत था। उसके चारों ओर उन्होंने बाड़ बँधवाई। इसके बीच में वे चाँदनी को बाँधते थे। रस्सी इतनी लंबी रखते थे कि वह खूब इधर-उधर घूम सके। इस तरह बहुत दिन बीत गए। अब्बू खाँ को विश्वास हो गया कि चाँदनी कहीं नहीं जा सकती।



मगर अब्बू खाँ धोखे में थे। आजादी की इच्छा इतनी आसानी से किसी के मन से नहीं जाती। चाँदनी पहाड़ की खुली हवा को भूल नहीं पाई थी। एक दिन चाँदनी ने पहाड़ की ओर देखा। उसने मन-ही-मन सोचा, वहाँ की हवा और यहाँ की हवा का क्या मुकाबला? फिर वहाँ उछलना, कूदना, ठोकरें खाना और यहाँ हर वक्त बँधे रहना। मन में इस विचार के आने के बाद चाँदनी अब पहले जैसी न रही। वह दिन-पर-दिन दुबली होने लगी। न उसे हरी घास अच्छी लगती और न पानी मजा देता। अजीब-सी दर्द भरी आवाज में वह ‘में-में’ चिल्लाती।



अब्बू खाँ समझ गए कि हो-न-हो कोई बात जरूर है, लेकिन उनकी समझ में न आता था कि बात क्या है? एक दिन अब्बू खाँ ने दूध दुह लिया, तो चाँदनी उदास भाव से उनकी ओर देखने लगी। मानो कह रही हो, “बड़े मियाँ, अब तुम्हारे पास रहूँगी तो बीमार हो जाऊँगी। मुझे तो तुम पहाड़ में जाने दो।”



अब्बू खाँ मानो उसकी बात समझ गए। चिल्लाकर बोले, “या अल्लाह! यह भी जाने को कहती है।“ वे सोचने लगे, “अगर यह पहाड़ पर चली गई, तो भेड़िया इसे भी खा जाएगा। पहले भी वह कई बकरियाँ खा चुका है।” उन्हें चाँदनी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। उन्होंने तय किया कि चाहे जो हो जाए, वे चाँदनी को पहाड़ पर नहीं जाने देंगे। उसे भेड़िये से जरूर बचायेंगे।



अब्बू खाँ ने चाँदनी को एक कोठरी में बंद कर दिया। ऊपर से साँकल चढ़ा दी। मगर गुस्से और झुंझलाहट में वे कोठरी की खिड़की बंद करना भूल गए। इधर उन्होंने कुंडी चढ़ाई और उधर चाँदनी उचक कर खिड़की से बाहर।



चाँदनी पहाड़ पर पहुँची, तो उसकी खुशी का क्या पूछना! पहाड़ पर पेड़ उसने पहले भी देखे थे, लेकिन आज उनका रंग और ही था। चाँदनी कभी इधर उछलती, कभी उधर। यहाँ कूदी, वहाँ फाँदी, कभी चट्टान पर है, तो कभी खड्डे में। इधर जरा फिसली, फिर संभली। एक चाँदनी के आने से पहाड़ में रौनक आ गई थी।



दोपहर तक वह इतनी उछली-कूदी कि शायद सारी उम्र में इतनी न उछली कूदी होगी। दोपहर ढले उसे पहाड़ी बकरियों का एक झुंड दिखाई दिया। थोड़ी देर तक वह उनके साथ रही। दोपहर बाद जब बकरियों का झुंड जाने लगा, तब वह उनके साथ नहीं गई। उसे आजादी इतनी प्यारी थी कि वह किसी के बंधन में पड़ना ही नहीं चाहती थी।



शाम का वक्त हुआ। ठंडी हवा चलने लगी। सारा पहाड़ लाल हो गया। चाँदनी पहाड़ से अब्बू खाँ के घर की ओर देख रही थी। धीरे-धीरे अब्बू खाँ का घर और काँटे वाला घेरा रात के अँधेरे में छिप रहा था।



रात का अँधेरा गहरा था। पहाड़ में एक तरफ आवाज आई-‘खूँ-खूँ’। यह आवाज सुनकर चाँदनी को भेड़िये का ख्याल आया। दिन भर में एक बार भी उसका ध्यान उधर न गया था। पहाड़ के नीचे सीटी और बिगुल की आवाज आई। वह बेचारे अब्बू खाँ थे। वे कोशिश कर रहे थे कि सीटी और बिगुल की आवाज सुनकर चाँदनी शायद लौट आए। उधर से दुश्मन भेड़िये की आवाज आ रही थी।



चाँदनी के मन में आया कि लौट चले। लेकिन उसे खूंटा याद आया। रस्सी याद आई। काँटों का घेरा याद आया। उसने सोचा कि इससे तो मौत अच्छी। आखिर सीटी और बिगुल की आवाज बंद हो गई। पीछे से पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई दी। चाँदनी ने मुड़कर देखा, तो दो कान दिखाई दिए, सीधे और खड़े हुए और दो आँखें, जो अँधेरे में चमक रही थीं। भेड़िया पहुँच गया था।



भेड़िया जमीन पर बैठा था। उसकी नजर बेचारी बकरी पर जमी हुई थी। उसे जल्दी न थी। वह जानता था कि बकरी कहीं नहीं जा सकती। वह अपनी लाल-लाल जीभ अपने नीले-नीले होंठों पर फेर रहा था।



पहले तो चाँदनी ने सोचा कि क्या लड़ूँ। भेड़िया बहुत ताकतवर है। उसके पास नुकीले बड़े-बड़े दाँत हैं। जीत तो उसकी ही होगी। लेकिन फिर उसने सोचा कि यह तो कायरता होगी। उसने सिर झुकाया। सींग आगे को किए और पैंतरा बदला। वह भेड़िये से लड़ गई। लड़ती रही। कोई न समझे कि चाँदनी भेड़िये की ताकत को नहीं जानती थी। वह खूब समझती थी कि बकरियाँ भेड़िये को नहीं मार सकती। लेकिन मुकाबला जरूरी है। बिना लड़े हार मानना कायरता है।



चाँदनी ने भेड़िये पर एक के बाद एक हमला किया। भेड़िया भी चकरा गया। लेकिन भेड़िया था। सारी रात गुजार गई। धीरे-धीरे चाँदनी की ताकत ने जवाब दे दिया, फिर भी उसने दुगना जोर लगाकर हमला किया। लेकिन भेड़िये के सामने उसका कोई बस नहीं चला। वह बेदम होकर जमीन पर गिर पड़ी। पास ही पेड़ पर बैठी चिड़ियाँ इस लड़ाई को देख रही थीं। उनमें बहस हो रही थी कि कौन जीता। बहुत सी चिड़ियों ने कहा, ‘भेड़िया जीता।’ पर एक बूढ़ी चिड़िया बोली, ‘चाँदनी जीती’।

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समाप्त

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लेखक - डॉक्टर जाकिर हुसैन

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इस कहानी से हमें निम्नलिखित बातें सीखने को मिलती है :-


1. हमें नासमझ अपनों अर्थात छोटे बच्चों की देखभाल में कभी लापरवाही नहीं करनी चाहिए।


जैसे अब्बू खाँ से एक खिड़की खुली रह गई। क्योंकि बच्चों को क्या पता ? साँप-बिच्छु के काटने से मृत्यु हो सकती है ? कौनसा कुत्ता काट सकता है और कौनसा कुत्ता नहीं काटेगा ? बच्चों के लिए तो सभी कुत्ते एक जैसे हैं।


2. हमें अपनों पर आवश्यकता से अधिक रोक-टोक नहीं लगानी चाहिए। आवश्यकता से अधिक रोक-टोक कैद जैसी लगने लगती है और कैद आखिर कैद ही होती है। पिंजरा चाहें सोने का हो, लेकिन कोई भी पिंजरे में नहीं रहना चाहता।


चाँदनी की तरह लड़के-लड़कियाँ घरवालों की अत्यधिक कठोरता के कारण घर से भाग जाते हैं।


जैसे अब्बू खाँ शाम के समय सीटी और बिगुल बजाते हैं कि सीटी और बिगुल की आवाज सुनकर शायद चाँदनी लौट आएँ।


इसी प्रकार घरवाले विज्ञापन वगैरह देते हैं, लेकिन बच्चे घरवालों की अत्यधिक कठोरता या अत्यधिक रोक-टोक को याद करके चाँदनी की तरह वापस नहीं आते।


उदाहरण के लिए यदि अब्बू खाँ खुद ही हर रोज़ घंटेभर के लिए चाँदनी को पहाड़ पर घूमा लाते, तो संभवतः चाँदनी अकेली पहाड़ पर जाने के लिए इतनी लालायित नहीं होती। और चली भी जाती, तो अब्बू खाँ के प्रेम को याद करके सीटी और बिगुल की आवाज सुनकर लौट आती।


3. हमें अपनों पर रोक-टोक लगाने की बजाय अपनों को समझाने का प्रयास करना चाहिए।


उदाहरण के लिए माता-पिता अक्सर अपने छोटे बच्चों को अन्जान लोगों के साथ बात करने से मना करते हैं, अन्जान लोगों से खाने-पीने की चीज़े लेने से मना करते हैं। क्योंकि छोटे बच्चों का अपहरण होता रहता है।


मेरे विचार से बच्चों को स्पष्ट समझाना चाहिए कि कई घटिया लोग बच्चों का अपहरण करके ले जाते हैं और बच्चों को मारते-पीटते हैं, भूखा रखते हैं, बहुत बुरा व्यवहार करते हैं।


इसी प्रकार छोटे बच्चों को यौन अपराधों के प्रति भी सचेत कर देना चाहिए कि कोई तुम्हें यहाँ हाथ लगाएँ, तो बता देना। ऐसी-ऐसी हरकतें करने वाले लोग गन्दे होते हैं और बच्चों को मार देते हैं।


ये बात लड़के-लड़कियों दोनों के लिए हैं। क्योंकि कई नीच प्रवृत्ति के हवसी छोटे लड़कों के साथ भी गुदा मैथुन जैसे अपराध करते हैं। 8-10 वर्ष की आयु तक के बच्चों को इतना समझाना पर्याप्त है। इसमें कोई अश्लीलता या कुछ आपत्तिजनक नहीं है। जान है, तो जहाँन है।


4. हमसे प्रेम करने वाले गलत हो सकते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य हमारे साथ बुरा करना नहीं हो सकता। इसलिए हमें विचार करना चाहिए कि हमसे प्रेम करने वाले हमारे साथ बुरा क्यों कर रहे हैं ?


हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि महिलाएँ केवल उन पुरुषों को समझती हैं, जिन पुरुषों के साथ महिलाएँ भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई हो। जैसे कि पिता, भाई, दोस्त, पति, बेटा वगैरह-वगैरह।


इसी प्रकार पुरुष केवल उन महिलाओं को समझते हैं, जिन महिलाओं के साथ पुरुष भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हो। जैसे कि माता, बहन, सहेली, पत्नी, बेटी वगैरह-वगैरह।


ये कहना सरासर मूर्खता है कि महिला किसी भी पुरुष के छल-कपट को समझ सकती है या पुरुष किसी भी महिला के छल-कपट को समझ सकते हैं।


इसलिए पुरुषों के बारे में अपने घर के पुरुषों और अपने निकटतम मित्र पुरुषों से सुझाव लेना चाहिए और महिलाओं के बारे में अपने घर की महिलाओं और अपनी निकटतम मित्र महिलाओं से सुझाव लेना चाहिए। क्योंकि महिलाओं को महिलाएँ अधिक समझती हैं और पुरुषों को पुरुष ही अधिक समझते हैं।


5. हमें अपनों अर्थात अपने घर-परिवार और मित्र समूह अर्थात हम जिनको भली-भांति जानते और समझते हैं, उनके साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए। लड़के तो अपने मित्र समूह के साथ मोस्टली मिल-जुलकर रहते हैं, लेकिन लड़कियों में लड़कियों के साथ मिल-जुलकर रहने का अभाव है, इसीलिए लड़कियों के साथ अपराध अधिक होते हैं।


अगर चाँदनी अकेली रहने की बजाय बकरियों के झुंड के साथ चली जाती, तो बच जाती। और भेड़िया झुंड पर हमला करता, तो सभी बकरियाँ मिलकर भेड़िये का मुकाबला करने में भी सक्षम थी। इसलिए हमें हमेशा अपने घर-परिवार और मित्र-समूह के साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए।


6. और अंत में सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि यदि किसी कारण हम संकट में फँस जाएँ, तो संकट चाहें कितना भी बड़ा हो ? चाहें हमारी मृत्यु या बलात्कार तय हो ? हमें किसी भी परिस्थिति में घूटने नहीं टेकने चाहिए।


पहले तो स्वयं पर संयम रखते हुए बुद्धिमानी से सुरक्षित निकलने का प्रयास करो, लेकिन यदि सुरक्षित निकलने का कोई रास्ता नहीं है, तो फिर लड़कर मरो।


क्योंकि जब शिकार होना या मरना ही है, तो शिकार होने या मरने से पहले बचने का एक अंतिम प्रयास अवश्य करना चाहिए।

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लेखक - वर्मन गढ़वाल

Tuesday, June 16, 2020

मानसिक तनाव या डिप्रेशन

पहले मेरे पिताजी ने हनुमानगढ़ में हमारे घर पर ही किरयाना की दुकान खोल रखी थी। 2004-05 से पहले हमारी दुकान अच्छी चलती थी, इसलिए पिताजी क्वांटिटी में सामान लाते थे।

आजकल 50 किलोग्राम चीनी के कट्टे आते हैं, लेकिन उस समय एक क्विंटल अर्थात 100 किलोग्राम की चीनी से भरी बोरी आती थी। मेरे पिताजी चीनी से भरी चार-पाँच बोरी एक साथ खच्चर गाड़ी पर लाते थे। खच्चर गाड़ी लगभग घोड़े जैसा पशु है। दिखने में बिल्कुल घोड़ा ही लगता है। जैसे ऊँटगाड़ी और बैलगाड़ी होती है, वैसे ही खच्चर गाड़ी होती है।

उस समय आयु में 20 वर्ष से लेकर 50 वर्ष तक के लोग खच्चर गाड़ी चलाया करते थे। मेरे पिताजी उनमें से किसी एक खच्चर गाड़ी वाले से बात कर लेते थे।

खच्चर गाड़ी वाला एक क्विंटल चीनी से भरी बोरियाँ, 50 किलोग्राम चावल से भरे बोरे इत्यादि अकैले ही हँसते-मुस्कुराते हुए बाज़ार में दुकानों से उठाकर खच्चर गाड़ी में और हमारे घर आकर खच्चर गाड़ी से पीठ पर लादकर बड़े आराम से हमारे घर के अन्दर रख देता था।

मेरे पिताजी बचपन से बीमार रहे हैं, इसलिए पिताजी एक क्विंटल चीनी की बोरी अकेले हिला भी नहीं सकते।

मेरी मम्मी बीमार होने से पहले 42-43 वर्ष की आयु होने तक 40 से 50 किलो वजन सर पर उठाकर बड़े आराम से आधा किलोमीटर पैदल चल लेती थी।

मेरी मम्मी बताती है कि मेरी बड़ी मामी और छोटी मामी पहले डेढ़ मन अर्थात 60 किलोग्राम वजन सर पर उठाकर खेत से लगभग ढ़ाई किलोमीटर बड़े आराम से पैदल चलकर घर आती थी।

मैं पहले 25-30 किलोग्राम वजन उठाकर थोड़ा-बहुत चल लेता था, लेकिन अभी 20 किलोग्राम वजन उठाकर मैं 20 मीटर पैदल नहीं चल सकता।

यहाँ कहने का अभिप्राय यह है कि सभी लोगों की क्षमता अलग-अलग होती है। एक व्यक्ति एक क्विंटल चीनी से भरी बोरी बड़े आराम से उठा लेता है, लेकिन दूसरा व्यक्ति के लिए अकेले उस बोरी को हिलाना भी संभव नहीं है। कुछ महिलाएँ 60 किलोग्राम वजन सर पर उठाकर बड़े आराम से चल लेती है, कुछ महिलाएँ केवल 40-50 किलोग्राम वजन उठाकर चल पाती है और मेरे जैसे लोगों के लिए 20 किलोग्राम वजन उठाकर चलना भी मुश्किल होता है।

इसी प्रकार सभी लोगों में मानसिक तनाव का सामना करने की क्षमता भी अलग-अलग होती है। हमने सफलतापूर्वक मानसिक तनाव का सामना कर लिया, इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी लोगों की मानसिक क्षमता हमारे जैसी ही है। हम किसी तरह जीवित बच गए, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मरने वाले कायर और डरपोक है।

कुछ दिन पहले मैंने असफल होने के कारण आत्महत्या करने वालों पर एक पोस्ट किया था कि असफल होने पर आत्महत्या करने का मूल कारण लोगों का असफल व्यक्ति को असफलता के कारण अपमानित करना और मज़ाक उड़ाना है।

इसका उपाय यह है कि व्यक्ति को बचपन से ही असफलता का सामना करने के लिए तैयार रहना सिखाना चाहिए। उदाहरण के लिए पढ़ाई में गंभीर और मेहनती बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि असफल होने पर असफल व्यक्ति के साथ क्या-क्या नकारात्मक होता है ? इस नकारात्मक वातावरण और इन नकारात्मक लोगों का सामना कैसे करना है ? बच्चे को ये समझाना अतिआवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में सफलता को कन्फर्म नहीं मानना चाहिए और असफलता सामान्य बात है।

इसी प्रकार किसी अपने को खोने के कारण तनावग्रस्त होने वाले व्यक्ति को छोटे बच्चों के बीच ले जाने से हँसते-खिलखिलाते बच्चे देखकर व्यक्ति का मानसिक तनाव कम होता है। क्योंकि छोटे बच्चे समझदार लोगों की तरह कुछ समझाने का प्रयास तो करते नहीं है। इसलिए किसी अपने को खोने वाला व्यक्ति छोटे बच्चों की निःस्वार्थ भावनाओं में अपनापन महसूस करता है और व्यक्ति के मन में जीने की इच्छा जागृत होती है।

यदि कोई व्यक्ति कारोबार में घाटा होने या नौकरी जाने या काम-धंधा ना मिलने के कारण मानसिक अवसाद का शिकार होता है, तो उसे सहयोग की आवश्यकता होती है। अब कोई किसी का मानसिक तनाव ठीक करने के लिए अपना धन तो देगा नहीं, इसलिए ऐसे व्यक्ति को असफलता के कारण बताने की बजाय पुनः नई शुरुआत करने के लिए प्रेरित करके कोई नौकरी या कोई काम दिलवाने में सहयोग करना चाहिए।

इसमें अधिक अमीर लोगों के साथ यह समस्या रहती है कि कोई नौकरी या छोटी नौकरी या छोटा काम करने पर आस-पास के लोग उनकी असफलता याद दिलाकर उनको अपमानित करते रहते हैं।

किसी तरह का झूठा आरोप लगने या किसी अन्य कारण से इज्ज़त खराब होने पर तनावग्रस्त होने वाले व्यक्ति को भी ताने मारकर और मज़ाक उड़ाकर अपमानित करने वालों से दूर रखना चाहिए।

हमें यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति का जीवन अलग होता है। हर व्यक्ति के जीवन में परेशानियाँ और मुसीबतें अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के जीवन में आस-पास का वातावरण और परिस्थितियाँ अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के जीवन में घर-परिवार के सदस्य, आस-पड़ोस के लोग, दोस्त, रिश्तेदार, मिलने-जुलने वाले सभी लोग भी अलग-अलग तरह के होते हैं। इन सभी बातों का व्यक्ति मानसिक स्थिति पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

इस तरह हम अलग-अलग केस में पहले अच्छी तरह पूरा मामला और सभी तरह की परिस्थितियों को समझकर व्यक्ति को मानसिक तनाव का शिकार होने से बचाने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन व्यक्ति के आस-पास वाले ढ़ेर सारे लोगों को कैसे समझाएं ?

इसलिए सबसे अच्छा यहीं है कि मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को नकारात्मक बातें करने वालों से, किसी भी तरह की गन्दी बातें करने वालों से, मज़ाक उड़ाने वालों से, ताने मारने वालों से, अपमानित करने वालों से दूर रखना चाहिए।

मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या यहीं है कि वो अकेले कुछ नहीं कर सकता। अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को अकेला छोड़ दिया, तब तो उसकी आत्महत्या लगभग तय है।

अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के आस-पास का वातावरण और आस-पास के लोग अच्छे नहीं होंगे, तो व्यक्ति को लगेगा कि इस बेकार दुनिया में जीने की बजाय मरना ही उचित है। इसलिए किसी आत्महत्या करने वाले को कायर और डरपोक कहने की बजाय आत्महत्या के कारण और परिस्थितियों को समझकर अपने आस-पास ध्यान रखना चाहिए कि हमारे आस-पास कोई व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार तो नहीं है ? और यदि है, तो ये मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को आत्महत्या से रोकने के लिए ये अस्थायी उपाय किये जा सकते हैं।

अब मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को खराब वातावरण और नकारात्मक लोगों से दूर कैसे रखना है ? अच्छे वातावरण और अच्छे लोगों के बीच कैसे ले जाना है ? यह मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के निकटतम लोगों की जिम्मेदारी बनती है।

सबसे पहले तो यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। किसी ना किसी को हमेशा मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के आस-पास रहकर व्यक्ति पर नज़र रखनी चाहिए और समय-समय पर व्यक्ति के साथ बातचीत जारी रखनी चाहिए। वरना मानसिक तनाव का शिकार व्यक्ति कुछ ना कुछ सोचता रहता है और अवसर मिलते ही आत्महत्या का प्रयास करता है।

अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ लगातार बातचीत करते रहेंगे, तो व्यक्ति का ध्यान बातचीत में रहेगा और व्यक्ति के दिमाग में अधिक से अधिक विचार बातचीत संबंधी आएँगे। इससे व्यक्ति सोच-विचार नहीं कर पाएँगा और सोच-विचार नहीं करेगा, तो आत्महत्या के बारे में भी नहीं सोचेगा।

मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ बातचीत करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को कुछ समझाने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।

अधिकांश लोग मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को समझाने का प्रयास करके सबसे बड़ी गलती करते हैं। क्योंकि लोग जो समझाते हैं, मानसिक तनाव का शिकार व्यक्ति वो सब पहले ही बहुत अच्छी तरह बारीकी से सोच चुका होता है।

इसलिए मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ

"उस लड़की/लड़के को भूल जा"

"माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी, बच्चों के बारे में सोचो।"

सफल लोगों के किस्से-कहानियाँ सुनाने और जीवन में आगे क्या करना चाहिए ?

जैसी बातें बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए।

इस तरह की बातों से मानसिक तनाव बढ़ जाता है। क्योंकि व्यक्ति पहले से ही ये सब सोच चुका होता है, इसलिए लोग अन्जाने में बार-बार इन बातों को दोहराकर व्यक्ति के आत्महत्या के निर्णय को याद दिलाते रहते हैं और व्यक्ति के आत्महत्या करने का निर्णय धीरे-धीरे अधिक मजबूत हो जाता है।

कोई भी व्यक्ति किसी को अपना मानने के बाद कभी भूलता नहीं है, इसलिए यदि किसी अपने की मृत्यु के कारण व्यक्ति तनावग्रस्त है, तो कहना चाहिए कि मिलना-बिछड़ना और जीवन-मृत्यु जीवन का हिस्सा है। अब इस सच्चाई के साथ जीना है, इसलिए इसे स्वीकार करो।

यदि बेवफाई जैसा कोई मसला हो, तो कहना चाहिए कि तुम उसकी खुश देखना चाहते हो या उसको दुःखी करके अपने साथ देखना चाहते हो ? वो तुम्हारे साथ खुश नहीं थी/था। तुम्हें छोड़कर वो खुश है। तुम उससे प्यार करते हो, तो उसे खुश देखकर मर क्यों रहे हो ?

अगर सच्चा प्रेमी हुआ या सच्ची प्रेमिका हुई, तो ये बात समझाने के बाद आत्महत्या का नाम भी याद नहीं रहेगा।

इसके अलावा आत्महत्या का कोई अन्य कारण हो, तो मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति से कोई ना कोई छोटी-मोटी सहायता मांगते रहना चाहिए।

जैसे कि मम्मी-पापा ये बात नहीं मान रहे, मम्मी-पापा को कैसे मनाऊँ ? भाई-बहन नाराज़ हो गये, कैसे मनाऊँ ? नाराज़ गर्लफ्रैंड को कैसे मनाऊँ ? नाराज़ बॉयफ्रैंड को कैसे मनाऊँ ? और कुछ नहीं तो मेरी कोई गर्लफ्रैंड नहीं है, गर्लफ्रैंड कैसे मनाऊँ ? अपने कारोबार या नौकरी की कोई प्रोब्लम बताकर सोल्यूशन पूछ सकते हैं ? इस तरह की कोई भी इधर-उधर की बातें बताकर कुछ ना कुछ पूछते रहने से व्यक्ति का ध्यान इन बातों में लगा रहता है और व्यक्ति का मानसिक तनाव धीरे-धीरे कम  होने लगता है।

यहाँ एक और आवश्यक बात जान लीजिए कि मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या का निर्णय करने वाला व्यक्ति धर्म-मज़हब, जाँत-पाँत, अमीरी-गरीबी, नारी-पुरुष, फलाना-ढ़िमका जैसे सभी भेदभाव से मुक्त हो जाता है। क्योंकि उसे तो मरना होता है, इसलिए ये सब उसके किस काम के ? इसलिए अगर आपकी भावनाएँ सच्ची हो, तो मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या का निर्णय करने वाला व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से आपकी सहायता करने का हरसंभव प्रयास करता है। कम से कम जब तक व्यक्ति के दिमाग में आत्महत्या का निर्णय होता है, तब तक व्यक्ति पूर्णतया निःस्वार्थ होता है।

इस तरह मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है। यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखिए कि ऊपर बताएँ गये तरीके केवल अस्थायी उपाय है। अर्थात व्यक्ति का मानसिक तनाव कुछ समय के लिए कम हो जाता है, लेकिन किसी विपरीत परिस्थिति में मानसिक तनाव दूबारा भी हो सकता है।

उदाहरण के लिए किसी लड़के की प्रेमिका का देहांत हो गया। लड़के का मानसिक तनाव कम करने के लिए लड़के को एक-डेढ़ महीने के लिए किसी रिश्तेदार के यहाँ, जिसके घर में छोटे बच्चे हो। या किसी अन्य जगह जहाँ कुछ छोटे बच्चे हर रोज लड़के से मिलते-जुलते रहें। वहाँ भेज दिया।

लड़का बच्चों के बीच रहकर ठीक हो सकता है, लेकिन लड़का जब वापस पुराने वातावरण में, पुराने लोगों के बीच आएँगा, तो फिर से सब याद आने और सारी दुःखी करने वाली बातें दिमाग में घूमने से दूबारा समस्या हो सकती है। इसलिए ये केवल अस्थायी उपाय होता है।

आत्महत्या रोकने के लिए स्थायी उपाय लगभग असंभव है, लेकिन फिर अपने आस-पास सकारात्मक वातावरण बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

जहाँ असफल लोगों को अपमानित किये बिना पुनः प्रयास करने या किसी अन्य क्षेत्र में सफल होने के लिए प्रेरित किया जाएँ। सब लोग ना सुधरे, लेकिन कुछ लोग ऐसे हो, जिससे व्यक्ति को विश्वास रहें कि असफलता के कारण मेरा अपमान नहीं होगा।

जहाँ प्यार का अर्थ एक-दूसरे पर नियंत्रण करने की बजाय एक-दूसरे को खुश रखना और आवश्यकता पड़ने पर कभी भी अलग होने की आजादी देना हो। इससे ब्रेकअप, धोखे और डिवॉर्स के कारण होने वाली आत्महत्याएँ बहुत कम हो जाएँगी।

जहाँ आरोप साबित होने से पहले व्यक्ति को अपराधी ना माना जाएँ।

जहाँ कोई फैसला बच्चे और माता-पिता मिल-जुलकर करते हो।

जहाँ बच्चों के अपनी इच्छा से विवाह करने पर माता-पिता को अपमानित ना किया जाएँ।

इस तरह आत्महत्याओं के सभी तरह के कारणों और सभी तरह की परिस्थितियों पर विचार करके अपने आस-पास अच्छा और सकारात्मक वातावरण बनाना आत्महत्याएँ रोकने का स्थायी उपाय है। आत्महत्या करने वालों को कोसने और आत्महत्याओं पर दुःख व्यक्त करने से ना तो आज तक कोई आत्महत्या रूकी है और ना ही कभी कोई आत्महत्या रूकेगी। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप केवल कोसने या दुःख व्यक्त करने की औपचारिकताएँ निभाते रहना चाहते हैं या फिर आत्महत्याओं को रोकना चाहते हैं ?
~~~~~~~~~~#Varman_Garhwal
14-06-2020, #वर्मन_गढ़वाल
Last Time - 1976
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विशेष ध्यान देने योग्य स्पेशल नोट :- मैंने इस पोस्ट में एक शब्द "मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति" का उपयोग किया है।

मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या और मानसिक तनाव के कारण अपने साथ-साथ दूसरों को नुकसान पहुँचाना पूरी तरह अलग-अलग विषय है।  इसके अलावा क्षणिक आवेग के कारण आत्महत्या भी पूरी तरह अलग विषय है।

अतः इस बात का विशेष ध्यान रखिए कि ये पोस्ट केवल मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या करने वालों को ध्यान में रखकर लिखी है।

मानसिक तनाव के कारण खुद के साथ-साथ दूसरों को नुकसान पहुँचाना और क्षणिक आवेग के कारण आत्महत्या करना पूर्णतया अलग मामला है।