Sunday, October 28, 2018

राजस्थानी भाषा

राजस्थानी भाषा—


राजस्थान अपनी संस्कृति, कला, रहन-सहन, पहनावे और जलवायु में विभिन्नता के कारण केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। दुनिया के अन्य देशों में रहने वाले भारतीय लोग राजस्थानी नहीं हो, फिर भी गर्व से कहते हैं कि राजस्थान हमारे भारत में है। भारत के अन्य राज्यों के लोगों के दिलों में भी राजस्थान का विशेष स्थान है।

राजस्थान मुख्य रूप से रेगिस्तानी प्रदेश के रूप में जाना जाता है। क्योंकि राजस्थान का लगभग 70% हिस्सा मरुस्थल है। हालांकि राजस्थान में पहाड़ी और मैदानी इलाके भी है, जिनके कारण राजस्थान को लघु भारत भी कहा जाता है।

राजस्थान के बारे में एक कहावत मशहूर है कि "चार कोस पर बदले पाणी और आठ कोस पर बदले वाणी।" राजस्थान में हर चार कोस बाद पानी का स्वाद बदल जाता है और हर आठ कोस बाद बोली बदल जाती है।

राजस्थान में ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मारवाड़ी और बागड़ी चार प्रमुख भाषाएं हैं, जिनमें से अनगिनत अलग-अलग बोलियाँ निकली हैं। भाषा और बोली के बारे में कहा जाता है कि जिसकी अपनी अलग लिपि हो, वह भाषा होती है और जिसकी अपनी कोई लिपि ना हो, वह बोली होती है। राजस्थान की चारों भाषा देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है, लेकिन राजस्थानी भाषाओं में बहुत से ऐसे शब्द है, जो दुनिया में प्रचलित किसी भी लिपि में नहीं लिखे जा सकते। इसलिए संभव हैं कि प्राचीन समय में राजस्थानी भाषा की अपनी अलग लिपि रही हो। वर्तमान समय में ऐसे अधिकांश शब्द विलुप्त हो चुके है और जो शब्द अभी प्रचलन में हैं, उनका प्रयोग बहुत कम होता हैं।

राजस्थानी भाषा को सरकारी मान्यता नहीं है, इसलिए पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली, कन्नड़, तमिल, मलयालम आदि की तरह इसे स्कूलों में पढ़ाया नहीं जाता। इस कारण धीरे-धीरे शिक्षित लोगों ने राजस्थानी भाषा का प्रयोग करना छोड़ दिया। राजस्थान में केवल नाममात्र के लोग हैं, जो राजस्थानी भाषा से प्रेम करते हैं।

राजस्थानी भाषाओं के पतन के लिए सरकार को दोषी ठहराया जाता है, लेकिन इसका प्रमुख कारण स्वयं राजस्थानी लोग ही है। पुराने समय में राजस्थानी भाषाओं के विकास के लिए क्या हुआ और क्या नहीं हुआ ? इस पर चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है। वर्तमान समय में राजस्थानी भाषा बोलने वालों को अनपढ़-ग्वार लोगों की श्रेणी में रखा जाता हैं। इसलिए धीरे-धीरे सामान्य जनजीवन में भी राजस्थानी भाषाओं का प्रयोग समाप्त हो रहा है।

अगर अन्य राज्यों से तुलना करें, तो पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु के लोग सामान्य बातचीत के लिए अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं। यदि सामने वाले उनकी भाषा बोलने और समझने में असमर्थ हो, तभी वे हिन्दी या अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं। राजस्थान के लोग जब सामने वाले केवल राजस्थानी बोलते और समझते हो, तब जाकर राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हैं। अन्य राज्यों के लोग अपने राज्य से दूर रहकर भी अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा सिखाने का प्रयास करते है। कुछ माता-पिता तो अधिक सम्पन्न ना होते हुए भी स्पेशल ट्यूशन लगाकर अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा सिखाते हैं। राजस्थानी लोगों का राजस्थान से दूर रहकर अपने बच्चों को राजस्थानी भाषा सीखाना तो बहुत दूर की बात है, राजस्थान में रहने वाले माता-पिता अपने बच्चों को डांटकर कहते हैं कि अरे, उनके सामने आड़ू की तरह राजस्थानी में बात मत करना। बढ़िया तरीके से हिन्दी और अंग्रेजी में बात करना। ये राजस्थानी लोगों का राजस्थानी भाषा के प्रति सम्मान है।

अपनी मातृभाषा को तुच्छ समझने के मामले में राजस्थानी पुरुषों की अपेक्षा राजस्थानी महिलाओं की संख्या अधिक है। राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों को राजस्थानी भाषा में बातचीत करते हुए देखा जा सकता है, लेकिन राजस्थानी महिलाएँ हिन्दी और अंग्रेजी ना आती हो, तब भी घर से बाहर राजस्थानी भाषा की बजाय हिन्दी और अंग्रेजी बोलने का प्रयास करती हुई देखी जा सकती है।

साहित्य से जुड़ने के बाद कुछ राजस्थानी साहित्यकारों से भी बातचीत हुई, जिनमें से कुछ मेरी मित्रसुची में भी है, लेकिन मैंने कभी उन्हें राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हुए नहीं देखा। राजस्थानी लोगों के साथ भी वे हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में ही बात करते हैं। यहाँ तक कि राजस्थानी रचनाएँ लिखने वाले साहित्यकार भी केवल रचनाएँ राजस्थानी भाषा में लिखते हैं, लेकिन बातचीत हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में ही करते हैं। अन्य राज्यों के लोगों को आपसी बातचीत के दौरान अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते हुए अक्सर देखा जा सकता हैं। इसका कारण स्पष्ट है कि उन्हें अपनी मातृभाषा पर कोई शर्मिन्दगी महसुस नहीं होती, इसलिए जहाँ मौका मिलता है, वे लोग अपनी भाषा सहज होकर बोलते हैं।

राजस्थानी भाषाओं के पतन का सबसे बड़ा कारण यहीं है कि राजस्थानी लोग खुद ही अपनी मातृभाषा का सम्मान नहीं करते। राजस्थानी लोगों को अपनी मातृभाषा बोलने में शर्मिन्दगी महसुस होती है। अगर किसी राजस्थानी को कोई दूसरा राजस्थानी मिलता हैं, तब भी वो राजस्थानी में बात करने की बजाय हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू का प्रयोग करना पसन्द करते हैं।

कुछ दिन पहले मैंने यास्मीन खान जी की एक रचना पढ़ी, जिसमें यास्मीन जी ने लिखा हैं कि सब भाषा सीखो, लेकिन अपनी मातृभाषा मत भूलो। यहीं बात मैं राजस्थानियों से कहना चाहूँगा कि हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी ही नहीं, सभी भाषाएं सीखो भी, पढ़ो भी, लिखो भी और बोलो भी, लेकिन अपनी मातृभाषा बोलने में भी झिझक या शर्मिन्दगी नहीं होनी चाहिए।

जब हम खुद ही अपनी मातृभाषा बोलने में शर्मिन्दगी महसूस करेंगे, अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा बोलने से मना करेंगे, तो दूसरों से सम्मान की आस करना तो केवल मूर्खता है। सरकार ने हमारी मातृभाषा को मान्यता नहीं दी, लेकिन सरकार ने ये थोड़े ही कहा है कि राजस्थान के लोग राजस्थानी भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते। स्कूलों में राजस्थानी भाषा नहीं सिखाई जाती, लेकिन घर पर घर के सदस्य तो आपस में राजस्थानी भाषा का प्रयोग कर ही सकते है। जब घर के बड़े राजस्थानी भाषा का प्रयोग करेंगे, तो बच्चे उनको देख-सुनकर अपने आप सीख जाएंगे और जब बच्चे इस माहौल में बड़े होंगे, तो वो भी अपने बच्चों को यहीं सब सिखाएगे।

किसी भी बात के लिए हमें दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। अपनी संस्कृति को, अपनी विरासत को हमें खुद संभालना चाहिए। जब लोगों को जरूरत ही नहीं है, तो सरकार राजस्थानी भाषा को मान्यता क्यों देगी। वहीं माता-पिता खुद स्कूलों से कहे कि हमें हमारे बच्चों को राजस्थानी भाषा भी सीखानी हैं, तो ऐसे अभिभावकों की संख्या अधिक होने पर स्कूल खुद अपने विज्ञापनों में यह कहना शुरू कर देंगे कि हमारे स्कूल में उच्च स्तर के शिक्षकों द्वारा राजस्थानी भाषा भी सिखाई जाती है। जब राजस्थानी जनता का रूझान राजस्थानी भाषा की तरफ़ होगा, तो राजस्थानी भाषा को मान्यता देने के लिए सरकार अपने आप विवश हो जाएँगी। यह भी हो सकता है कि कुछ समय तक ये चुनावी मुद्दा बन जाए और राजनीतिक लोगों के भाषण में हमें सुनने को मिले कि अगर हमारी सरकार बनती हैं, तो हम राजस्थानी भाषा को सरकारी मान्यता देंगे। इसलिए हमारी पार्टी को वोट देकर हमें विजयी बनाए। 

यहाँ कहने का अर्थ यह है कि कोई भी कार्य तभी सम्पन्न होता है, जब जनता को उस कार्य में दिलचस्पी होती हैं। उदाहरण के लिए इस समय देश की जनता को धर्म-मज़हब, दलित-स्वर्ण और नारी-पुरुष जैसे मसलों में दिलचस्पी हैं, इसलिए यहीं सब चुनावी मुद्दे बने हुए है। जब देश की जनता में वास्तविक समस्याओं को समाप्त करने की इच्छा होगी, तो देश के राजनीतिक लोग देश की वास्तविक समस्याओं को समाप्त करना भी शुरू कर देंगे। इसी प्रकार अगर राजस्थान के लोग राजस्थानी भाषा का विकास चाहते हैं, इसके लिए पहल उन्हें खुद करनी होगी। अगर कोई राजस्थानी भाषा बोलने पर आपका मजाक उड़ाता है, तो उसे केवल इतना कहें कि मैं सभी भाषाओं का सम्मान करता हूँ, लेकिन अपनी भाषा भूल ना जाऊँ, इसलिए बोलता रहता हूँ।
..............................#Varman_Garhwal
11-09-2018, #वर्मन_गढ़वाल
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