Tuesday, June 16, 2020

मानसिक तनाव या डिप्रेशन

पहले मेरे पिताजी ने हनुमानगढ़ में हमारे घर पर ही किरयाना की दुकान खोल रखी थी। 2004-05 से पहले हमारी दुकान अच्छी चलती थी, इसलिए पिताजी क्वांटिटी में सामान लाते थे।

आजकल 50 किलोग्राम चीनी के कट्टे आते हैं, लेकिन उस समय एक क्विंटल अर्थात 100 किलोग्राम की चीनी से भरी बोरी आती थी। मेरे पिताजी चीनी से भरी चार-पाँच बोरी एक साथ खच्चर गाड़ी पर लाते थे। खच्चर गाड़ी लगभग घोड़े जैसा पशु है। दिखने में बिल्कुल घोड़ा ही लगता है। जैसे ऊँटगाड़ी और बैलगाड़ी होती है, वैसे ही खच्चर गाड़ी होती है।

उस समय आयु में 20 वर्ष से लेकर 50 वर्ष तक के लोग खच्चर गाड़ी चलाया करते थे। मेरे पिताजी उनमें से किसी एक खच्चर गाड़ी वाले से बात कर लेते थे।

खच्चर गाड़ी वाला एक क्विंटल चीनी से भरी बोरियाँ, 50 किलोग्राम चावल से भरे बोरे इत्यादि अकैले ही हँसते-मुस्कुराते हुए बाज़ार में दुकानों से उठाकर खच्चर गाड़ी में और हमारे घर आकर खच्चर गाड़ी से पीठ पर लादकर बड़े आराम से हमारे घर के अन्दर रख देता था।

मेरे पिताजी बचपन से बीमार रहे हैं, इसलिए पिताजी एक क्विंटल चीनी की बोरी अकेले हिला भी नहीं सकते।

मेरी मम्मी बीमार होने से पहले 42-43 वर्ष की आयु होने तक 40 से 50 किलो वजन सर पर उठाकर बड़े आराम से आधा किलोमीटर पैदल चल लेती थी।

मेरी मम्मी बताती है कि मेरी बड़ी मामी और छोटी मामी पहले डेढ़ मन अर्थात 60 किलोग्राम वजन सर पर उठाकर खेत से लगभग ढ़ाई किलोमीटर बड़े आराम से पैदल चलकर घर आती थी।

मैं पहले 25-30 किलोग्राम वजन उठाकर थोड़ा-बहुत चल लेता था, लेकिन अभी 20 किलोग्राम वजन उठाकर मैं 20 मीटर पैदल नहीं चल सकता।

यहाँ कहने का अभिप्राय यह है कि सभी लोगों की क्षमता अलग-अलग होती है। एक व्यक्ति एक क्विंटल चीनी से भरी बोरी बड़े आराम से उठा लेता है, लेकिन दूसरा व्यक्ति के लिए अकेले उस बोरी को हिलाना भी संभव नहीं है। कुछ महिलाएँ 60 किलोग्राम वजन सर पर उठाकर बड़े आराम से चल लेती है, कुछ महिलाएँ केवल 40-50 किलोग्राम वजन उठाकर चल पाती है और मेरे जैसे लोगों के लिए 20 किलोग्राम वजन उठाकर चलना भी मुश्किल होता है।

इसी प्रकार सभी लोगों में मानसिक तनाव का सामना करने की क्षमता भी अलग-अलग होती है। हमने सफलतापूर्वक मानसिक तनाव का सामना कर लिया, इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी लोगों की मानसिक क्षमता हमारे जैसी ही है। हम किसी तरह जीवित बच गए, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मरने वाले कायर और डरपोक है।

कुछ दिन पहले मैंने असफल होने के कारण आत्महत्या करने वालों पर एक पोस्ट किया था कि असफल होने पर आत्महत्या करने का मूल कारण लोगों का असफल व्यक्ति को असफलता के कारण अपमानित करना और मज़ाक उड़ाना है।

इसका उपाय यह है कि व्यक्ति को बचपन से ही असफलता का सामना करने के लिए तैयार रहना सिखाना चाहिए। उदाहरण के लिए पढ़ाई में गंभीर और मेहनती बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि असफल होने पर असफल व्यक्ति के साथ क्या-क्या नकारात्मक होता है ? इस नकारात्मक वातावरण और इन नकारात्मक लोगों का सामना कैसे करना है ? बच्चे को ये समझाना अतिआवश्यक है कि किसी भी परिस्थिति में सफलता को कन्फर्म नहीं मानना चाहिए और असफलता सामान्य बात है।

इसी प्रकार किसी अपने को खोने के कारण तनावग्रस्त होने वाले व्यक्ति को छोटे बच्चों के बीच ले जाने से हँसते-खिलखिलाते बच्चे देखकर व्यक्ति का मानसिक तनाव कम होता है। क्योंकि छोटे बच्चे समझदार लोगों की तरह कुछ समझाने का प्रयास तो करते नहीं है। इसलिए किसी अपने को खोने वाला व्यक्ति छोटे बच्चों की निःस्वार्थ भावनाओं में अपनापन महसूस करता है और व्यक्ति के मन में जीने की इच्छा जागृत होती है।

यदि कोई व्यक्ति कारोबार में घाटा होने या नौकरी जाने या काम-धंधा ना मिलने के कारण मानसिक अवसाद का शिकार होता है, तो उसे सहयोग की आवश्यकता होती है। अब कोई किसी का मानसिक तनाव ठीक करने के लिए अपना धन तो देगा नहीं, इसलिए ऐसे व्यक्ति को असफलता के कारण बताने की बजाय पुनः नई शुरुआत करने के लिए प्रेरित करके कोई नौकरी या कोई काम दिलवाने में सहयोग करना चाहिए।

इसमें अधिक अमीर लोगों के साथ यह समस्या रहती है कि कोई नौकरी या छोटी नौकरी या छोटा काम करने पर आस-पास के लोग उनकी असफलता याद दिलाकर उनको अपमानित करते रहते हैं।

किसी तरह का झूठा आरोप लगने या किसी अन्य कारण से इज्ज़त खराब होने पर तनावग्रस्त होने वाले व्यक्ति को भी ताने मारकर और मज़ाक उड़ाकर अपमानित करने वालों से दूर रखना चाहिए।

हमें यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति का जीवन अलग होता है। हर व्यक्ति के जीवन में परेशानियाँ और मुसीबतें अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के जीवन में आस-पास का वातावरण और परिस्थितियाँ अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के जीवन में घर-परिवार के सदस्य, आस-पड़ोस के लोग, दोस्त, रिश्तेदार, मिलने-जुलने वाले सभी लोग भी अलग-अलग तरह के होते हैं। इन सभी बातों का व्यक्ति मानसिक स्थिति पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

इस तरह हम अलग-अलग केस में पहले अच्छी तरह पूरा मामला और सभी तरह की परिस्थितियों को समझकर व्यक्ति को मानसिक तनाव का शिकार होने से बचाने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन व्यक्ति के आस-पास वाले ढ़ेर सारे लोगों को कैसे समझाएं ?

इसलिए सबसे अच्छा यहीं है कि मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को नकारात्मक बातें करने वालों से, किसी भी तरह की गन्दी बातें करने वालों से, मज़ाक उड़ाने वालों से, ताने मारने वालों से, अपमानित करने वालों से दूर रखना चाहिए।

मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या यहीं है कि वो अकेले कुछ नहीं कर सकता। अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को अकेला छोड़ दिया, तब तो उसकी आत्महत्या लगभग तय है।

अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के आस-पास का वातावरण और आस-पास के लोग अच्छे नहीं होंगे, तो व्यक्ति को लगेगा कि इस बेकार दुनिया में जीने की बजाय मरना ही उचित है। इसलिए किसी आत्महत्या करने वाले को कायर और डरपोक कहने की बजाय आत्महत्या के कारण और परिस्थितियों को समझकर अपने आस-पास ध्यान रखना चाहिए कि हमारे आस-पास कोई व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार तो नहीं है ? और यदि है, तो ये मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को आत्महत्या से रोकने के लिए ये अस्थायी उपाय किये जा सकते हैं।

अब मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को खराब वातावरण और नकारात्मक लोगों से दूर कैसे रखना है ? अच्छे वातावरण और अच्छे लोगों के बीच कैसे ले जाना है ? यह मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के निकटतम लोगों की जिम्मेदारी बनती है।

सबसे पहले तो यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। किसी ना किसी को हमेशा मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के आस-पास रहकर व्यक्ति पर नज़र रखनी चाहिए और समय-समय पर व्यक्ति के साथ बातचीत जारी रखनी चाहिए। वरना मानसिक तनाव का शिकार व्यक्ति कुछ ना कुछ सोचता रहता है और अवसर मिलते ही आत्महत्या का प्रयास करता है।

अगर मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ लगातार बातचीत करते रहेंगे, तो व्यक्ति का ध्यान बातचीत में रहेगा और व्यक्ति के दिमाग में अधिक से अधिक विचार बातचीत संबंधी आएँगे। इससे व्यक्ति सोच-विचार नहीं कर पाएँगा और सोच-विचार नहीं करेगा, तो आत्महत्या के बारे में भी नहीं सोचेगा।

मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ बातचीत करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को कुछ समझाने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।

अधिकांश लोग मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को समझाने का प्रयास करके सबसे बड़ी गलती करते हैं। क्योंकि लोग जो समझाते हैं, मानसिक तनाव का शिकार व्यक्ति वो सब पहले ही बहुत अच्छी तरह बारीकी से सोच चुका होता है।

इसलिए मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति के साथ

"उस लड़की/लड़के को भूल जा"

"माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी, बच्चों के बारे में सोचो।"

सफल लोगों के किस्से-कहानियाँ सुनाने और जीवन में आगे क्या करना चाहिए ?

जैसी बातें बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए।

इस तरह की बातों से मानसिक तनाव बढ़ जाता है। क्योंकि व्यक्ति पहले से ही ये सब सोच चुका होता है, इसलिए लोग अन्जाने में बार-बार इन बातों को दोहराकर व्यक्ति के आत्महत्या के निर्णय को याद दिलाते रहते हैं और व्यक्ति के आत्महत्या करने का निर्णय धीरे-धीरे अधिक मजबूत हो जाता है।

कोई भी व्यक्ति किसी को अपना मानने के बाद कभी भूलता नहीं है, इसलिए यदि किसी अपने की मृत्यु के कारण व्यक्ति तनावग्रस्त है, तो कहना चाहिए कि मिलना-बिछड़ना और जीवन-मृत्यु जीवन का हिस्सा है। अब इस सच्चाई के साथ जीना है, इसलिए इसे स्वीकार करो।

यदि बेवफाई जैसा कोई मसला हो, तो कहना चाहिए कि तुम उसकी खुश देखना चाहते हो या उसको दुःखी करके अपने साथ देखना चाहते हो ? वो तुम्हारे साथ खुश नहीं थी/था। तुम्हें छोड़कर वो खुश है। तुम उससे प्यार करते हो, तो उसे खुश देखकर मर क्यों रहे हो ?

अगर सच्चा प्रेमी हुआ या सच्ची प्रेमिका हुई, तो ये बात समझाने के बाद आत्महत्या का नाम भी याद नहीं रहेगा।

इसके अलावा आत्महत्या का कोई अन्य कारण हो, तो मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति से कोई ना कोई छोटी-मोटी सहायता मांगते रहना चाहिए।

जैसे कि मम्मी-पापा ये बात नहीं मान रहे, मम्मी-पापा को कैसे मनाऊँ ? भाई-बहन नाराज़ हो गये, कैसे मनाऊँ ? नाराज़ गर्लफ्रैंड को कैसे मनाऊँ ? नाराज़ बॉयफ्रैंड को कैसे मनाऊँ ? और कुछ नहीं तो मेरी कोई गर्लफ्रैंड नहीं है, गर्लफ्रैंड कैसे मनाऊँ ? अपने कारोबार या नौकरी की कोई प्रोब्लम बताकर सोल्यूशन पूछ सकते हैं ? इस तरह की कोई भी इधर-उधर की बातें बताकर कुछ ना कुछ पूछते रहने से व्यक्ति का ध्यान इन बातों में लगा रहता है और व्यक्ति का मानसिक तनाव धीरे-धीरे कम  होने लगता है।

यहाँ एक और आवश्यक बात जान लीजिए कि मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या का निर्णय करने वाला व्यक्ति धर्म-मज़हब, जाँत-पाँत, अमीरी-गरीबी, नारी-पुरुष, फलाना-ढ़िमका जैसे सभी भेदभाव से मुक्त हो जाता है। क्योंकि उसे तो मरना होता है, इसलिए ये सब उसके किस काम के ? इसलिए अगर आपकी भावनाएँ सच्ची हो, तो मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या का निर्णय करने वाला व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से आपकी सहायता करने का हरसंभव प्रयास करता है। कम से कम जब तक व्यक्ति के दिमाग में आत्महत्या का निर्णय होता है, तब तक व्यक्ति पूर्णतया निःस्वार्थ होता है।

इस तरह मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है। यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखिए कि ऊपर बताएँ गये तरीके केवल अस्थायी उपाय है। अर्थात व्यक्ति का मानसिक तनाव कुछ समय के लिए कम हो जाता है, लेकिन किसी विपरीत परिस्थिति में मानसिक तनाव दूबारा भी हो सकता है।

उदाहरण के लिए किसी लड़के की प्रेमिका का देहांत हो गया। लड़के का मानसिक तनाव कम करने के लिए लड़के को एक-डेढ़ महीने के लिए किसी रिश्तेदार के यहाँ, जिसके घर में छोटे बच्चे हो। या किसी अन्य जगह जहाँ कुछ छोटे बच्चे हर रोज लड़के से मिलते-जुलते रहें। वहाँ भेज दिया।

लड़का बच्चों के बीच रहकर ठीक हो सकता है, लेकिन लड़का जब वापस पुराने वातावरण में, पुराने लोगों के बीच आएँगा, तो फिर से सब याद आने और सारी दुःखी करने वाली बातें दिमाग में घूमने से दूबारा समस्या हो सकती है। इसलिए ये केवल अस्थायी उपाय होता है।

आत्महत्या रोकने के लिए स्थायी उपाय लगभग असंभव है, लेकिन फिर अपने आस-पास सकारात्मक वातावरण बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

जहाँ असफल लोगों को अपमानित किये बिना पुनः प्रयास करने या किसी अन्य क्षेत्र में सफल होने के लिए प्रेरित किया जाएँ। सब लोग ना सुधरे, लेकिन कुछ लोग ऐसे हो, जिससे व्यक्ति को विश्वास रहें कि असफलता के कारण मेरा अपमान नहीं होगा।

जहाँ प्यार का अर्थ एक-दूसरे पर नियंत्रण करने की बजाय एक-दूसरे को खुश रखना और आवश्यकता पड़ने पर कभी भी अलग होने की आजादी देना हो। इससे ब्रेकअप, धोखे और डिवॉर्स के कारण होने वाली आत्महत्याएँ बहुत कम हो जाएँगी।

जहाँ आरोप साबित होने से पहले व्यक्ति को अपराधी ना माना जाएँ।

जहाँ कोई फैसला बच्चे और माता-पिता मिल-जुलकर करते हो।

जहाँ बच्चों के अपनी इच्छा से विवाह करने पर माता-पिता को अपमानित ना किया जाएँ।

इस तरह आत्महत्याओं के सभी तरह के कारणों और सभी तरह की परिस्थितियों पर विचार करके अपने आस-पास अच्छा और सकारात्मक वातावरण बनाना आत्महत्याएँ रोकने का स्थायी उपाय है। आत्महत्या करने वालों को कोसने और आत्महत्याओं पर दुःख व्यक्त करने से ना तो आज तक कोई आत्महत्या रूकी है और ना ही कभी कोई आत्महत्या रूकेगी। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप केवल कोसने या दुःख व्यक्त करने की औपचारिकताएँ निभाते रहना चाहते हैं या फिर आत्महत्याओं को रोकना चाहते हैं ?
~~~~~~~~~~#Varman_Garhwal
14-06-2020, #वर्मन_गढ़वाल
Last Time - 1976
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विशेष ध्यान देने योग्य स्पेशल नोट :- मैंने इस पोस्ट में एक शब्द "मानसिक तनाव के शिकार व्यक्ति" का उपयोग किया है।

मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या और मानसिक तनाव के कारण अपने साथ-साथ दूसरों को नुकसान पहुँचाना पूरी तरह अलग-अलग विषय है।  इसके अलावा क्षणिक आवेग के कारण आत्महत्या भी पूरी तरह अलग विषय है।

अतः इस बात का विशेष ध्यान रखिए कि ये पोस्ट केवल मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या करने वालों को ध्यान में रखकर लिखी है।

मानसिक तनाव के कारण खुद के साथ-साथ दूसरों को नुकसान पहुँचाना और क्षणिक आवेग के कारण आत्महत्या करना पूर्णतया अलग मामला है।