आज मेरे बचपन की अर्थात जब मेरी आयु आठ-दस वर्ष से कम थी, तब की दो बातें बताता हूँ।
हमारे मोहल्ले में तो सबके घर साधारण से थे। किसी के घर डोरबेल वगैरह नहीं थी, लेकिन हमारे मोहल्ले के आस-पास की कॉलोनी में कई नौकरीपेशा लोग रहते थे। उन सबके घर पर डोरबेल लगी हुई थी।
मैं अक्सर हमारे आस-पड़ोस के मेरी उम्र वाले लड़के-लड़कियों को लेकर दोपहर के समय उनके घर की ओर जाता था और उनके घर की डोरबेल बजाते थे।
मेरे डोरबेल बजाते ही अन्य सभी लड़के-लड़कियाँ भाग जाते थे, लेकिन मैं वहीं आस-पास बैठ जाता था या खड़ा रहता था। मेरे चेहरे के हाव-भाव और मेरी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती थी, जैसे मैंने तो कुछ किया ही नहीं। मुझे खुद इस तरह डोरबेल बजाकर लोगों को परेशान करना बुरा लग रहा है।
जब घर से आन्टी या भैया-दीदी बाहर आकर मुझे देखते थे, तो मेरी ऐसी मासूमियत भरी बॉडी लैंग्वेज देखकर मुझसे ही पूछते थे कि घंटी किसने बजाई ?
मैं मासूमियत से बता देता था कि वो इधर से चार-पाँच लड़के-लड़कियाँ आए थे। वो चार-पाँच लड़के-लड़कियाँ उधर भाग गये।
मेरी बात सुनकर आन्टी, भैया, दीदी जो भी होते थे, वो बच्चों को बिगड़ैल, आवारा वगैरह बोलकर वापस अन्दर चले जाते थे।
हालाँकि कुछ समय बाद उन सबको पता चल गया कि सभी बच्चों को घेर-घारकर लाता तो यहीं है, लेकिन सबको पता चलने के बाद मैंने डोरबेल बजाना ही छोड़ दिया।
इसी तरह स्कूल में भी पहली क्लास से ही मेरी मासूम और भोली-भाली छवि बनी हुई थी।
मैं अक्सर दूसरे बच्चों को परेशान करता था और जो बच्चे मेरे सामने ज्यादा होशियारी दिखाते थे, उनको पीट भी देता था, लेकिन जब टीचर को मेरी शिकायत करने जाते, तो मैं खुद ही रोने लग जाता था।
इस तरह पहली क्लास से पाँचवी क्लास तक जब भी किसी बच्चे ने टीचर से मेरी शिकायत की, टीचर का हर बार यहीं जवाब होता था कि इसको दो साल हो गये इस स्कूल में। आज तक कभी इसकी कोई शिकायत नहीं आई कि इसने किसी को परेशान किया है, किसी को गाली दी है या किसी को मारा-पीटा है ?
इसमें मैडम के डायलॉग में प्रतिवर्ष केवल साल बढ़ जाता था, जैसे कि इसको तीन साल हो गये इस स्कूल में। इसको चार साल हो गये इस स्कूल में। बाकी डायलॉग पाँचवी तक सेम ही रहा था।
इससे आप यह समझ सकते हैं कि हमारे चेहरे के हाव-भाव और हमारी बॉडी लैंग्वेज अर्थात हमारे एक्सप्रेशन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। मैं थोड़ा-थोड़ा टाइम लगभग आधे भारत के कई शहरों और गाँवों में रह चुका हूँ। सभी जगह पर मुझसे मिलने वालों लोगों को लगा कि मैं वहीं का ही हूँ। यहाँ तक कि साउथ इंडिया में भी लोग यहीं समझते थे कि मैं साउथ इंडियन ही हूँ, बस मुझे साउथ इंडियन भाषा नहीं आती।
इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप अन्जान लोगों को लूटने वालों की लिस्ट से बाहर हो जाते हैं। क्योंकि ये लूटने वाले मोस्टली बाहर से आए हुए अन्जान लोगों को ही अपना शिकार बनाते हैं। हालांकि दिल्ली में ये सारे समीकरण फैल हो जाते हैं। क्योंकि दिल्ली में ही पले-बढ़े मेरे कई मित्र कई बार इनका शिकार बन चुके हैं।
एक-दो बार शिकार बनना सामान्य बात है, लेकिन चार-पाँच बार या आठ-दस बार शिकार बन रहे हैं ? इसका मतलब दिल्ली का कुछ अलग ही गणित है, जो दिल्ली में पले-बढ़े लोगों को समझ से भी बाहर है।
खैर, खुद को इस तरह वातानुकूलित बनाने के लिए सबको अपना समझना आवश्यक है। अगर हम हर गाँव को, हर शहर को, हर देश को अपना समझेंगे, तो कोई भी यह नहीं कह सकता कि हम बाहर से आए है। सबको यहीं लगेगा कि हम वहीं कहीं आस-पास के ही है, बस हमें भाषा नहीं आती, हमारा पहनावा और खान-पान अलग है।
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07-06-2021, #वर्मन_गढ़वाल
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