पहले हम राजस्थान के हनुमानगढ़ जंक्शन में रहते थे। वहाँ हमारा घर अभी-भी है, जिसमें चिड़ियों के घोंसले मिल जाएँगे। मैं पाँच-सात वर्ष का था, तब की बात है। एक दिन एक घोंसले से चिड़िया का बच्चा नीचे गिर गया। मैंने अपने पापा को बताया, तो उन्होंने बच्चे को वापस घोंसले में रख दिया। जब चिड़िया आई, तो चिड़िया ने बच्चे को फिर से नीचे गिरा दिया। ऐसा तीन-चार बार हुआ, हमने चिड़िया के बच्चे को चिड़िया के घोंसले में रखा और चिड़िया ने हर बार बच्चे को नीचे गिरा दिया। अंत में तीसरी या चौथी बार वो बच्चा नीचे गिरने के बाद मर गया।
मेरी मम्मी ने बताया कि चिड़िया के बच्चे को कोई हाथ लगा दें, तो चिड़िया उसे नहीं अपनाती।
इसके बाद मैंने जानबूझकर अन्य चिड़ियों के बच्चों को हाथ लगाया और हर बार यहीं हुआ। चिड़िया की अनुपस्थिति में चिड़िया के बच्चे को हाथ लगाने पर भी चिड़िया उसे घोंसले से गिरा देती थी।
कुछ समय बाद एक एक घोंसले से एक चिड़िया का बच्चा नीचे गिर गया। चिड़िया के बच्चे को उड़ना नहीं आता था, इसलिए चिड़िया उसे घोंसले में वापस ले जा नहीं सकती थी और अगर हम उसे घोंसले में रखते, तो चिड़िया उसे अपनाएगी नहीं। ये सोचकर मैंने चिड़िया के बच्चे को चावल के दाने, बाजरे के दाने और पानी वगैरह देकर उसके लिए एक अलग जगह बना दी। कुछ दिन बाद चिड़िया बड़ी हो गई और धीरे-धीरे उड़ने लगी, लेकिन वो चिड़िया तोते-कबूतर की तरह ही हमारे पास आकर बैठ जाती थी और ची-ची किया करती थी। उस चिड़िया की अन्य चिड़ियों के साथ बहुत कम बनती थी। उसने अपना घोंसला तो हमारे घर में ही बनाया था, लेकिन अन्य चिड़ियों से दूर, जहाँ हम भी आसानी से उस तक पहुंच सकते थे।
कुछ समय बाद उस चिड़िया ने भी अंडे दिये और समयानुसार अंडों में से बच्चे भी निकले। उसके तीन बच्चे थे। हमने उसके बच्चों को हाथ नहीं लगाया, लेकिन जब उसके बच्चे थोड़े बड़े हुए, तो वो खुद ही अपने बच्चों को हमारे पास ले आती थी। यहाँ खास बात है कि उस चिड़िया और उस चिड़िया के तीनों बच्चों का ऐसा व्यवहार केवल हमारे और हमारे घर आने वाले एक-दो मानव के बच्चों मतलब मेरे साथ खेलने वाले बच्चों में से एक-दो बच्चों के लिए ही था। अन्य मानवों मतलब हमारे आस-पड़ौस के लोगों के लिए उनका व्यवहार अन्य चिड़ियों जैसा ही था। वो चिड़िया और चिड़िया के बच्चे चार-छह महीने तक हमारे घर में घूमते थे, उसके बाद उनका कुछ पता नहीं।
मुझे बचपन में तोते पालने की भी इच्छा थी। मैंने एक के बाद एक चार तोतों के बच्चे खरीदे भी थे, लेकिन वो बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे, इसलिए उनको बिल्ली खा गई।
एक दिन दोपहर के समय दो लड़के हमारी दुकान पर आए। दुकान में मेरे मम्मी-पापा बैठे थे। उन लड़कों के पास एक तोते का बच्चा था, जिसे बेचने के लिए वो पकड़कर लाए थे। मेरी मम्मी ने तोते के बच्चे को देखा, तो उसके पंख कतरे हुए थे। एक पंख टूट चुका था और एक पैर बुरी तरह जख्मी था।
मेरे मम्मी-पापा के पूछने पर पता चला कि वो लड़के बहुत बेरहमी से उस तोते को पकड़कर लाए थे।
उस समय हनुमानगढ़ में बहुत से लोग इसी तरह तोते पकड़कर बेचा करते थे। मेरे मम्मी-पापा ने मेरे लिए 50 रुपये में वो तोते का बच्चा खरीद लिया। वो तोते का बच्चा सारा दिन चुपचाप गुमसुम-सा बैठा रहता था। हम उसे खाने के लिए हरीमिर्च, टमाटर, बिस्कुट वगैरह देते, तो दिन में एक या दो बार ही खाता था। इसके अलावा हम उसके साथ खेलने या बोलने की चाहे कितनी भी कोशिश करें, लेकिन वो मायूस-सा चुपचाप ही रहता था। उसे देखकर ही साफ़ पता चलता था कि वो बहुत उदास है।
हमने उस तोते का नाम मिट्ठू रख दिया था। हमारे घर में एक शहतूत का पेड़ था, दिनभर उस पेड़ पर कई तोते आकर बैठते थे। मिठ्ठू के कारण हमारे घर आने वाले तोतो की संख्या भी बढ़ गई।मिट्ठू हमारे साथ बिल्कुल नहीं बोलता था, लेकिन अन्य तोतो के साथ टें-टें करके बातें करता था। हालांकि उसकी टें-टें में उदासी ही होती थी। कभी-कभी हम उसे शहतूत के पेड़ पर बिठा देते थे, तो वो उड़ने की कोशिश करता था और नीचे आकर गिर जाता। उस समय उसकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती थी, जैसे गिरने के बाद किसी अपाहिज इन्सान की होती है। उसके मायूस भाव देखकर लगता था, जैसे वो पूछ रहा है कि आखिर मेरी गलती क्या है ? जैसे हम किसी अपाहिज भिखारी को दयाभाव से देखते हैं, बिल्कुल उसी तरह अन्य तोते भी उसकी ओर दयाभाव से देखते थे।
असल में उस तोते मिठ्ठू के दिल में इन्सानों के लिए नफ़रत थी। क्योंकि इन्सानों ने बिना कारण उसका एक पंख तोड़ दिया, जिसके कारण वो कभी उड़ नहीं सकता था। उसका एक पैर तोड़ दिया, जिसके कारण वो लंगड़ाकर चलता था। अब मैं उस तोते के व्यवहार और उसकी बॉडी लैंग्वेज याद करता हूँ, तो मुझे उसके अन्दर दबी हुई इन्सानों के प्रति नफ़रत का एहसास होता है।
एक रात लगभग साढ़े आठ बजे बहुत तेज आंधी आई। उस आंधी में कई पेड़ टूट गए थे, कई घर टूट गए थे। आंधी शुरू होते ही हम सब एक कमरे में आ गए। मेरे पापा ने पूछा कि मिठ्ठू कहाँ है ? मैंने कहा कि उसका तो पता नहीं।
मेरे पापा आंधी में ही उसे ढूंढने बाहर गए और लगभग एक घंटे तक उसे ढूंढते रहें। तोते को ढूंढने एक जगह दो-तीन बार मेरे पापा गए, लेकिन जब चौथी बार वहाँ गए, तो तोता टें-टें करके बताने लगा कि मैं यहाँ हूँ। तोते के मुँह से पहली बार कोई आवाज़ यहीं सुनी थी। इससे पहले तोते के टय-टय का मतलब कुछ ऐसा होता था, जैसे वो कह रहा हो कि मुझे परेशान मत करो।
मेरे पापा तोता जहाँ फँसा हुआ था, उसे वहाँ से निकालकर कमरे में ले आए और रात के 11 बजे आंधी बन्द होने के बाद हम सब सो गए।
अगली सुबह तोते ने टें-टें करके हम सबको जगाया था और जैसे पहले हम तोते के आगे-पीछे घूमते थे, अब तोता टें-टें करता हुआ हमारे आगे-पीछे घूमने लगा। टमाटर, हरीमिर्च, बिस्कुट, तरबूज, खरबूजा, भिन्डी सारा दिन टें-टें करके अपने लिए खाना भी मांगने लगा और वो भी अपनी पसन्द-नापसन्द के हिसाब से। जब तक उसकी पसन्द का खाना ना दो, तब तक उसकी टें-टें बन्द नहीं होती थी। हमने उसे कुछ भी नहीं सिखाया, लेकिन फिर भी वो दुकान में बैठ जाता था और ग्राहक आने पर टें-टें करके बुलाता था। कोई ग्राहक कुछ चुराने की कोशिश करता, तब भी वो टें-टें करने लगता था। कुल मिलाकर उस आंधी वाली रात के बाद उसके व्यवहार में ऐसा परिवर्तन आया कि उसने हम सबको अपना मान लिया और हम पर अपना अधिकार भी जताता था। इस तरह वो हमारे घर के सदस्य की तरह हो गया।
शहतूत के पेड़ पर अन्य तोतो के साथ बात करने के उसके अंदाज भी बदल गए। अन्य तोते भी पहले की तुलना में कुछ अलग मतलब मिट्ठू को खुश देखकर खुश नज़र आते थे।
कुल मिलाकर अब सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन बिल्ली का खतरा अभी-भी पहले जैसा ही था। ऊपर से मिट्ठू तो उड़ भी नहीं सकता था।
इस बीच बिल्ली ने तीन-चार बच्चे पैदा किये और बच्चों की जगह बदलने की प्रक्रिया में बिल्ली को एक कुत्ती ने मार दिया।
बिल्ली के दो बच्चे जीवित रहें, जिनमें से एक को हमने अपने घर में रख लिया। इस दौरान हमने एक कबूतर भी खरीद लिया। अब हमारे घर एक तोता, एक कबूतर और एक बिल्ली का बच्चा था। इस बीच जिस कुत्ती ने बिल्ली को मारा, वो कुत्ती भी कुछ पिल्ले पैदा करके मर गई। उन पिल्लों में से केवल एक पिल्ला जीवित रहा, जिसे हम अपने घर ले आए।
हमारे घर में तोता, कबूतर, बिल्ली और कुत्ता सब साथ ही रहते थे। इस दौरान दो वाक्ये हुए। एक एक दूसरी बिल्ली हमारे घर आई और तोते की ओर झपटी, जिसे हमारे घर रहने वाली माणु बिल्ली ने बचाया और माणु बिल्ली एक बार घर से बाहर गई, तो एक कुत्ता उसके पीछे पड़ गया। कुत्ता माणु बिल्ली को दबोचने ही वाला था कि हमारे घर रहने वाला कालू कुत्ते ने बीच में आकर माणु बिल्ली को बचा लिया। यहाँ खास बात यह है कि माणु बिल्ली ने जिस बिल्ली से मिठ्ठू तोते को बचाया, वो बिल्ली माणु बिल्ली की माँ की ही संतान थी।
इन चारों को एक-दूसरे से बहुत लगाव हो गया था। इनमें से सबसे पहले माणु बिल्ली की मौत हुई। वो स्वभाव से बहुत नटखट थी। एक दिन हमने ध्यान नहीं दिया और वो घर से बाहर चली गई। एक कुत्ते ने अचानक उसे गर्दन से पकड़कर बुरी तरह जख्मी कर दिया, जिससे वो मर गई।
माणु बिल्ली के मरने के बाद कालू कुत्ता, मिठ्ठू तोता और कबूतर तीनों उदास रहने लगे। कालू कुत्ता अक्सर घर से बाहर जाकर दूसरे कुत्तों से झगड़ता था और इसी कारण एक दिन गली के कुत्तों ने ही उसे मार दिया। मिठ्ठू तोते को कुछ दिन बाद बिल्ली खा गई और कबूतर बीमार होकर मर गया।
.............................#Varman_Garhwal
28-10-2018, #वर्मन_गढ़वाल
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मेरी मम्मी ने बताया कि चिड़िया के बच्चे को कोई हाथ लगा दें, तो चिड़िया उसे नहीं अपनाती।
इसके बाद मैंने जानबूझकर अन्य चिड़ियों के बच्चों को हाथ लगाया और हर बार यहीं हुआ। चिड़िया की अनुपस्थिति में चिड़िया के बच्चे को हाथ लगाने पर भी चिड़िया उसे घोंसले से गिरा देती थी।
कुछ समय बाद एक एक घोंसले से एक चिड़िया का बच्चा नीचे गिर गया। चिड़िया के बच्चे को उड़ना नहीं आता था, इसलिए चिड़िया उसे घोंसले में वापस ले जा नहीं सकती थी और अगर हम उसे घोंसले में रखते, तो चिड़िया उसे अपनाएगी नहीं। ये सोचकर मैंने चिड़िया के बच्चे को चावल के दाने, बाजरे के दाने और पानी वगैरह देकर उसके लिए एक अलग जगह बना दी। कुछ दिन बाद चिड़िया बड़ी हो गई और धीरे-धीरे उड़ने लगी, लेकिन वो चिड़िया तोते-कबूतर की तरह ही हमारे पास आकर बैठ जाती थी और ची-ची किया करती थी। उस चिड़िया की अन्य चिड़ियों के साथ बहुत कम बनती थी। उसने अपना घोंसला तो हमारे घर में ही बनाया था, लेकिन अन्य चिड़ियों से दूर, जहाँ हम भी आसानी से उस तक पहुंच सकते थे।
कुछ समय बाद उस चिड़िया ने भी अंडे दिये और समयानुसार अंडों में से बच्चे भी निकले। उसके तीन बच्चे थे। हमने उसके बच्चों को हाथ नहीं लगाया, लेकिन जब उसके बच्चे थोड़े बड़े हुए, तो वो खुद ही अपने बच्चों को हमारे पास ले आती थी। यहाँ खास बात है कि उस चिड़िया और उस चिड़िया के तीनों बच्चों का ऐसा व्यवहार केवल हमारे और हमारे घर आने वाले एक-दो मानव के बच्चों मतलब मेरे साथ खेलने वाले बच्चों में से एक-दो बच्चों के लिए ही था। अन्य मानवों मतलब हमारे आस-पड़ौस के लोगों के लिए उनका व्यवहार अन्य चिड़ियों जैसा ही था। वो चिड़िया और चिड़िया के बच्चे चार-छह महीने तक हमारे घर में घूमते थे, उसके बाद उनका कुछ पता नहीं।
मुझे बचपन में तोते पालने की भी इच्छा थी। मैंने एक के बाद एक चार तोतों के बच्चे खरीदे भी थे, लेकिन वो बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे, इसलिए उनको बिल्ली खा गई।
एक दिन दोपहर के समय दो लड़के हमारी दुकान पर आए। दुकान में मेरे मम्मी-पापा बैठे थे। उन लड़कों के पास एक तोते का बच्चा था, जिसे बेचने के लिए वो पकड़कर लाए थे। मेरी मम्मी ने तोते के बच्चे को देखा, तो उसके पंख कतरे हुए थे। एक पंख टूट चुका था और एक पैर बुरी तरह जख्मी था।
मेरे मम्मी-पापा के पूछने पर पता चला कि वो लड़के बहुत बेरहमी से उस तोते को पकड़कर लाए थे।
उस समय हनुमानगढ़ में बहुत से लोग इसी तरह तोते पकड़कर बेचा करते थे। मेरे मम्मी-पापा ने मेरे लिए 50 रुपये में वो तोते का बच्चा खरीद लिया। वो तोते का बच्चा सारा दिन चुपचाप गुमसुम-सा बैठा रहता था। हम उसे खाने के लिए हरीमिर्च, टमाटर, बिस्कुट वगैरह देते, तो दिन में एक या दो बार ही खाता था। इसके अलावा हम उसके साथ खेलने या बोलने की चाहे कितनी भी कोशिश करें, लेकिन वो मायूस-सा चुपचाप ही रहता था। उसे देखकर ही साफ़ पता चलता था कि वो बहुत उदास है।
हमने उस तोते का नाम मिट्ठू रख दिया था। हमारे घर में एक शहतूत का पेड़ था, दिनभर उस पेड़ पर कई तोते आकर बैठते थे। मिठ्ठू के कारण हमारे घर आने वाले तोतो की संख्या भी बढ़ गई।मिट्ठू हमारे साथ बिल्कुल नहीं बोलता था, लेकिन अन्य तोतो के साथ टें-टें करके बातें करता था। हालांकि उसकी टें-टें में उदासी ही होती थी। कभी-कभी हम उसे शहतूत के पेड़ पर बिठा देते थे, तो वो उड़ने की कोशिश करता था और नीचे आकर गिर जाता। उस समय उसकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती थी, जैसे गिरने के बाद किसी अपाहिज इन्सान की होती है। उसके मायूस भाव देखकर लगता था, जैसे वो पूछ रहा है कि आखिर मेरी गलती क्या है ? जैसे हम किसी अपाहिज भिखारी को दयाभाव से देखते हैं, बिल्कुल उसी तरह अन्य तोते भी उसकी ओर दयाभाव से देखते थे।
असल में उस तोते मिठ्ठू के दिल में इन्सानों के लिए नफ़रत थी। क्योंकि इन्सानों ने बिना कारण उसका एक पंख तोड़ दिया, जिसके कारण वो कभी उड़ नहीं सकता था। उसका एक पैर तोड़ दिया, जिसके कारण वो लंगड़ाकर चलता था। अब मैं उस तोते के व्यवहार और उसकी बॉडी लैंग्वेज याद करता हूँ, तो मुझे उसके अन्दर दबी हुई इन्सानों के प्रति नफ़रत का एहसास होता है।
एक रात लगभग साढ़े आठ बजे बहुत तेज आंधी आई। उस आंधी में कई पेड़ टूट गए थे, कई घर टूट गए थे। आंधी शुरू होते ही हम सब एक कमरे में आ गए। मेरे पापा ने पूछा कि मिठ्ठू कहाँ है ? मैंने कहा कि उसका तो पता नहीं।
मेरे पापा आंधी में ही उसे ढूंढने बाहर गए और लगभग एक घंटे तक उसे ढूंढते रहें। तोते को ढूंढने एक जगह दो-तीन बार मेरे पापा गए, लेकिन जब चौथी बार वहाँ गए, तो तोता टें-टें करके बताने लगा कि मैं यहाँ हूँ। तोते के मुँह से पहली बार कोई आवाज़ यहीं सुनी थी। इससे पहले तोते के टय-टय का मतलब कुछ ऐसा होता था, जैसे वो कह रहा हो कि मुझे परेशान मत करो।
मेरे पापा तोता जहाँ फँसा हुआ था, उसे वहाँ से निकालकर कमरे में ले आए और रात के 11 बजे आंधी बन्द होने के बाद हम सब सो गए।
अगली सुबह तोते ने टें-टें करके हम सबको जगाया था और जैसे पहले हम तोते के आगे-पीछे घूमते थे, अब तोता टें-टें करता हुआ हमारे आगे-पीछे घूमने लगा। टमाटर, हरीमिर्च, बिस्कुट, तरबूज, खरबूजा, भिन्डी सारा दिन टें-टें करके अपने लिए खाना भी मांगने लगा और वो भी अपनी पसन्द-नापसन्द के हिसाब से। जब तक उसकी पसन्द का खाना ना दो, तब तक उसकी टें-टें बन्द नहीं होती थी। हमने उसे कुछ भी नहीं सिखाया, लेकिन फिर भी वो दुकान में बैठ जाता था और ग्राहक आने पर टें-टें करके बुलाता था। कोई ग्राहक कुछ चुराने की कोशिश करता, तब भी वो टें-टें करने लगता था। कुल मिलाकर उस आंधी वाली रात के बाद उसके व्यवहार में ऐसा परिवर्तन आया कि उसने हम सबको अपना मान लिया और हम पर अपना अधिकार भी जताता था। इस तरह वो हमारे घर के सदस्य की तरह हो गया।
शहतूत के पेड़ पर अन्य तोतो के साथ बात करने के उसके अंदाज भी बदल गए। अन्य तोते भी पहले की तुलना में कुछ अलग मतलब मिट्ठू को खुश देखकर खुश नज़र आते थे।
कुल मिलाकर अब सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन बिल्ली का खतरा अभी-भी पहले जैसा ही था। ऊपर से मिट्ठू तो उड़ भी नहीं सकता था।
इस बीच बिल्ली ने तीन-चार बच्चे पैदा किये और बच्चों की जगह बदलने की प्रक्रिया में बिल्ली को एक कुत्ती ने मार दिया।
बिल्ली के दो बच्चे जीवित रहें, जिनमें से एक को हमने अपने घर में रख लिया। इस दौरान हमने एक कबूतर भी खरीद लिया। अब हमारे घर एक तोता, एक कबूतर और एक बिल्ली का बच्चा था। इस बीच जिस कुत्ती ने बिल्ली को मारा, वो कुत्ती भी कुछ पिल्ले पैदा करके मर गई। उन पिल्लों में से केवल एक पिल्ला जीवित रहा, जिसे हम अपने घर ले आए।
हमारे घर में तोता, कबूतर, बिल्ली और कुत्ता सब साथ ही रहते थे। इस दौरान दो वाक्ये हुए। एक एक दूसरी बिल्ली हमारे घर आई और तोते की ओर झपटी, जिसे हमारे घर रहने वाली माणु बिल्ली ने बचाया और माणु बिल्ली एक बार घर से बाहर गई, तो एक कुत्ता उसके पीछे पड़ गया। कुत्ता माणु बिल्ली को दबोचने ही वाला था कि हमारे घर रहने वाला कालू कुत्ते ने बीच में आकर माणु बिल्ली को बचा लिया। यहाँ खास बात यह है कि माणु बिल्ली ने जिस बिल्ली से मिठ्ठू तोते को बचाया, वो बिल्ली माणु बिल्ली की माँ की ही संतान थी।
इन चारों को एक-दूसरे से बहुत लगाव हो गया था। इनमें से सबसे पहले माणु बिल्ली की मौत हुई। वो स्वभाव से बहुत नटखट थी। एक दिन हमने ध्यान नहीं दिया और वो घर से बाहर चली गई। एक कुत्ते ने अचानक उसे गर्दन से पकड़कर बुरी तरह जख्मी कर दिया, जिससे वो मर गई।
माणु बिल्ली के मरने के बाद कालू कुत्ता, मिठ्ठू तोता और कबूतर तीनों उदास रहने लगे। कालू कुत्ता अक्सर घर से बाहर जाकर दूसरे कुत्तों से झगड़ता था और इसी कारण एक दिन गली के कुत्तों ने ही उसे मार दिया। मिठ्ठू तोते को कुछ दिन बाद बिल्ली खा गई और कबूतर बीमार होकर मर गया।
.............................#Varman_Garhwal
28-10-2018, #वर्मन_गढ़वाल
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अद्भुत संस्मरण। प्रेमभाव एक दूसरे के प्रति
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