Wednesday, October 31, 2018

दोस्ती - 2

सारे रिश्तों में दोस्ती सबसे सुविधाजनक रिश्ता है। दोस्ती करना भी बहुत आसान है और दोस्ती तोड़ना भी बहुत आसान है। गर्लफ्रैंड-बॉयफ्रैंड के रिश्ते में भी केवल अलग होने के कारण बेवफा और धोखेबाज जैसे आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन दोस्ती में ऐसे आरोप कोई बड़ा धोखा होने के बाद ही लगाए जा सकते हैं। दोस्ती के साधारण झगड़ों का तो कोई महत्व ही नहीं है। दोस्त आपस में एक-दूसरे को कितना समझते हैं। एक-दूसरे के जीवन में दोनों का क्या महत्व है ? यह सब केवल दोस्तों पर ही निर्भर करता है।

अगर दोस्ती एक लड़के और एक लड़की के बीच हो, तब तो बंटाधार ही समझो। एक लड़का जितना अधिकार अपने लड़के दोस्त पर जता सकता है और एक लड़की जितना अधिकार अपनी सहैली पर जता सकती है, उतना अधिकार लड़का-लड़की केवल गर्लफ्रैंड-बॉयफ्रैंड या शादी करके पति-पत्नी बनकर ही एक-दूसरे पर जता पाते हैं। केवल दोस्ती में उनकी बात और भावनाओं का कोई महत्व ही नहीं है।

लड़के-लड़की की दोस्ती में लड़के की भावनाओं का अचार बनना तय होता है। इसलिए समझदार लड़के लड़की से दोस्ती करते ही नहीं है। समझदार लड़कों की दोस्ती का मकसद ही यहीं होता है, कि पहले दोस्ती करो, फिर गर्लफ्रैंड बनाओ। क्योंकि लड़की के पास दोस्त के लिए रटा-रटाये जवाब हमेशा तैयार रहते हैं।

"हम सिर्फ दोस्त है, ओके।"

"बॉयफ्रैंड बनने की कोशिश मत करो, समझे।"

"हे भगवान! तुम मेरे बारे में इतना क्यों सोचते हो ?"

"ओ माइ गॉड ! तुम दोस्त हो, दोस्त बनकर रहो।"

"हाय अल्लाह ! तुम ये क्यों भूल जाते हो, वो मेरा बॉयफ्रैंड है ?"

ये केवल कुछ नमूने है। लड़के-लड़की के दोस्ती में इस तरह के और इससे मिलते-जुलते कई डायलॉग लड़कों को लड़कियों से सुनने को मिलते हैं।

लड़की यह विचार नहीं करती कि दोस्त की बात सही है या गलत ? अच्छी है या बुरी ? दोस्त भला सोच रहा है या बुरा ? दोस्त का भी बात करने का, मिलने-जुलने का मन होता है ? लेकिन नहीं। लडकी की जीवन में बॉयफ्रैंड आने के बाद दोस्त, दोस्त की बातें और दोस्त की भावनाएँ सब गई भाड़ में। लड़की का सब कुछ उसका बॉयफ्रैंड हो जाता है।

यहाँ कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि सभी लड़के दुध के धुले हुए है। यह सही है कि कुछ लड़के गलत इरादे से लड़कियों के साथ दोस्ती करते हैं, लेकिन जिनके मन में कोई गलत इरादा नहीं होता, जो हमेशा आपकी खुशी के बारे में सोचते हैं। कभी आप भी उनके बारे में सोच लिया करो।

यकिन मानिए, जो लड़के सच्चे दिल से दोस्ती करते हैं, वो किसी को आपसे दूर नहीं करना चाहते। उनको आपके बॉयफ्रैंड या आपके पति से कोई प्रोब्लम नहीं है। आपको परेशान या उदास देखकर वो मायूस हो जाते हैं। आपको खुश होकर हँसते-मुस्कुराते हुए देखकर वो खुश होते हैं। वो दोस्ती टूटने पर भी बॉयफ्रैंड की तरह आप पर आरोप नहीं लगाएंगे। लेकिन हाँ, दिल उनका भी दुखता है। चोट उनको भी लगती है। ये बात अलग है, कि बॉयफ्रैंड की तरह वो अपना दर्द जाहिर नहीं कर पाते। कुछ दोस्त करते भी है, तो लोग गलत अर्थ निकालते हैं। वो प्यार तो बहुत करते हैं, लेकिन उनके प्यार में आपकी खुशी के सिवा कुछ हासिल करने का स्वार्थ नहीं है। लड़की को अपनी सच्ची दोस्त बनाने वाले लड़के बहुत कम है, लेकिन जो है, वो लाजवाब है।

हाँ, लड़की से दोस्ती निभाते वहीं है, जिनके दिल और दिमाग में गन्दगी नहीं होती। लेकिन ये बात तो बॉयफ्रैंड और पति पर भी लागू होती है। जिनके इरादे गलत है, वो चाहे कोई भी रिश्ता बनाए, उनसे आपको तकलीफ ही मिलेगी।

अक्सर लड़कियाँ शादी होते ही सबसे पहले अपने लड़के दोस्तों को खुद से दूर करती है। लड़कियाँ ये भी नहीं सोचती, कि इससे उन दोस्तों के दिल पर क्या गुजरती है ? बॉयफ्रैंड लोग तो लड़की का चेहरा खराब करके या लड़की का मर्डर करके अपना प्यार दिखा देते हैं। क्योंकि बॉयफ्रैंड का मकसद आपकी खुशी नहीं, बल्कि खुद की खुशी होता है। बॉयफ्रैंड के लिए शादी के बाद भी कई लड़कियाँ रोती है। बॉयफ्रैंड के रिश्ते में फिजिकल रिलेशन की भावना भी होती है। इसलिए बॉयफ्रैंड का रिश्ता पति से छुपाना जरूरी है, लेकिन दोस्त का प्यार तो फिजिकल रिलेशन से बढ़कर होता है। फिर भी शादी होते ही सबसे पहले दोस्त को जीवन से बाहर करके दोस्त का दिल तोड़ दिया जाता है।

अगर लड़की ने किसी अच्छे इन्सान को दोस्त बनाया है, जिसके दिल में फिजिकल रिलेशन जैसी कोई भावना नही है। जो केवल लड़की की खुशी के बारे में सोचता है। उसे पति से छुपाने की क्या जरूरत है ? जो पति एक पुरुष होकर अपनी पत्नी के अच्छे पुरुष दोस्तों की भावनाओं को पहचान ना सकें, वो पत्नी की भावनाओं को कैसे समझेगा ? क्योंकि जो पत्नी धोखा देना चाहती है, वो अपने दोस्त को पति से क्यों मिलवाएगी ? और जिसके मन में खोट है, वो लड़की के पति से क्यों मिलेगा ? हाँ, कई लोग गलत इरादों से दोस्त बनते हैं, लेकिन पति-पत्नी में इतनी समझ तो होनी चाहिए कि वो अच्छे दोस्त और बुरे दोस्त की पहचान कर सकें। क्योंकि धोखा तो पति के दोस्त भी दे सकते हैं।

और हाँ,
और एक बात,
दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है, जिसे किसी भी रिश्ते में कन्वर्ट किया जा सकता है। नारी-पुरुष की मित्रता में आयु का अधिक अन्तर होने पर दोस्त माँ-बेटा या माँ-बेटी भी बन सकते हैं, बाप-बेटा या बाप-बेटी भी बन सकते हैं। जैसे समान आयु के दो दोस्त एक-दूसरे को भाई कह सकते हैं, दो सहैलियाँ एक-दूसरे को बहन कह सकती है, उसी तरह लड़का-लड़की दोस्ती में एक-दूसरे को भाई-बहन भी कह सकते हैं। वो कहें या ना कहें ? ये उनकी भावनाओं और इच्छा पर निर्भर करता है। लेकिन कोई यह सुनते ही असहज हो जाए, तो समझ जाओ, उसका असली इरादा दोस्ती की आड़ में कुछ और है। दोस्त एक-दूसरे को क्या कहते हैं ? यह उनकी आपसी सहमति की बात है, लेकिन जो सच्चे मन से दोस्ती करते हैं, वो हर बात में सहज रहते हैं।

दोस्ती के बाद गर्लफ्रैंड-बॉयफ्रैंड बनने या शादी करके पति-पत्नी बनने की इच्छा जागृत होना अलग बात हैं, लेकिन पहले से इस तरह की सोच लेकर प्लानिंग से दोस्ती करना चालाकी है। इस बात को समझने की जरूरत है।

अतः दोस्त बनकर अपना स्वार्थ साधने वालों से बचकर रहिए और अपनी बुद्धि व विवेक से सोच-समझकर अच्छे लोगों से दोस्ती कीजिए। और दोस्ती करने के बाद दोस्त की भावनाओं का सम्मान भी कीजिए। किसी भी अच्छे दोस्त को बिना उचित कारण खुद से दूर ना करें। जो आपको सच्चे दिल से दोस्त मानते हैं, यदि उनके कारण आपको कोई प्रोब्लम होने की संभावना रहती है, तो सच्चे दोस्त खुद ही आपसे दूर हो जाएंगे। क्योंकि आपकी भलाई में ही सच्चे दोस्तों की खुशी होती है।
..............................#Varman_Garhwal
06-10-2018, #वर्मन_गढ़वाल
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Sunday, October 28, 2018

राजस्थानी भाषा

राजस्थानी भाषा—


राजस्थान अपनी संस्कृति, कला, रहन-सहन, पहनावे और जलवायु में विभिन्नता के कारण केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। दुनिया के अन्य देशों में रहने वाले भारतीय लोग राजस्थानी नहीं हो, फिर भी गर्व से कहते हैं कि राजस्थान हमारे भारत में है। भारत के अन्य राज्यों के लोगों के दिलों में भी राजस्थान का विशेष स्थान है।

राजस्थान मुख्य रूप से रेगिस्तानी प्रदेश के रूप में जाना जाता है। क्योंकि राजस्थान का लगभग 70% हिस्सा मरुस्थल है। हालांकि राजस्थान में पहाड़ी और मैदानी इलाके भी है, जिनके कारण राजस्थान को लघु भारत भी कहा जाता है।

राजस्थान के बारे में एक कहावत मशहूर है कि "चार कोस पर बदले पाणी और आठ कोस पर बदले वाणी।" राजस्थान में हर चार कोस बाद पानी का स्वाद बदल जाता है और हर आठ कोस बाद बोली बदल जाती है।

राजस्थान में ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मारवाड़ी और बागड़ी चार प्रमुख भाषाएं हैं, जिनमें से अनगिनत अलग-अलग बोलियाँ निकली हैं। भाषा और बोली के बारे में कहा जाता है कि जिसकी अपनी अलग लिपि हो, वह भाषा होती है और जिसकी अपनी कोई लिपि ना हो, वह बोली होती है। राजस्थान की चारों भाषा देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है, लेकिन राजस्थानी भाषाओं में बहुत से ऐसे शब्द है, जो दुनिया में प्रचलित किसी भी लिपि में नहीं लिखे जा सकते। इसलिए संभव हैं कि प्राचीन समय में राजस्थानी भाषा की अपनी अलग लिपि रही हो। वर्तमान समय में ऐसे अधिकांश शब्द विलुप्त हो चुके है और जो शब्द अभी प्रचलन में हैं, उनका प्रयोग बहुत कम होता हैं।

राजस्थानी भाषा को सरकारी मान्यता नहीं है, इसलिए पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली, कन्नड़, तमिल, मलयालम आदि की तरह इसे स्कूलों में पढ़ाया नहीं जाता। इस कारण धीरे-धीरे शिक्षित लोगों ने राजस्थानी भाषा का प्रयोग करना छोड़ दिया। राजस्थान में केवल नाममात्र के लोग हैं, जो राजस्थानी भाषा से प्रेम करते हैं।

राजस्थानी भाषाओं के पतन के लिए सरकार को दोषी ठहराया जाता है, लेकिन इसका प्रमुख कारण स्वयं राजस्थानी लोग ही है। पुराने समय में राजस्थानी भाषाओं के विकास के लिए क्या हुआ और क्या नहीं हुआ ? इस पर चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है। वर्तमान समय में राजस्थानी भाषा बोलने वालों को अनपढ़-ग्वार लोगों की श्रेणी में रखा जाता हैं। इसलिए धीरे-धीरे सामान्य जनजीवन में भी राजस्थानी भाषाओं का प्रयोग समाप्त हो रहा है।

अगर अन्य राज्यों से तुलना करें, तो पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु के लोग सामान्य बातचीत के लिए अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं। यदि सामने वाले उनकी भाषा बोलने और समझने में असमर्थ हो, तभी वे हिन्दी या अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं। राजस्थान के लोग जब सामने वाले केवल राजस्थानी बोलते और समझते हो, तब जाकर राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हैं। अन्य राज्यों के लोग अपने राज्य से दूर रहकर भी अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा सिखाने का प्रयास करते है। कुछ माता-पिता तो अधिक सम्पन्न ना होते हुए भी स्पेशल ट्यूशन लगाकर अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा सिखाते हैं। राजस्थानी लोगों का राजस्थान से दूर रहकर अपने बच्चों को राजस्थानी भाषा सीखाना तो बहुत दूर की बात है, राजस्थान में रहने वाले माता-पिता अपने बच्चों को डांटकर कहते हैं कि अरे, उनके सामने आड़ू की तरह राजस्थानी में बात मत करना। बढ़िया तरीके से हिन्दी और अंग्रेजी में बात करना। ये राजस्थानी लोगों का राजस्थानी भाषा के प्रति सम्मान है।

अपनी मातृभाषा को तुच्छ समझने के मामले में राजस्थानी पुरुषों की अपेक्षा राजस्थानी महिलाओं की संख्या अधिक है। राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों को राजस्थानी भाषा में बातचीत करते हुए देखा जा सकता है, लेकिन राजस्थानी महिलाएँ हिन्दी और अंग्रेजी ना आती हो, तब भी घर से बाहर राजस्थानी भाषा की बजाय हिन्दी और अंग्रेजी बोलने का प्रयास करती हुई देखी जा सकती है।

साहित्य से जुड़ने के बाद कुछ राजस्थानी साहित्यकारों से भी बातचीत हुई, जिनमें से कुछ मेरी मित्रसुची में भी है, लेकिन मैंने कभी उन्हें राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हुए नहीं देखा। राजस्थानी लोगों के साथ भी वे हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में ही बात करते हैं। यहाँ तक कि राजस्थानी रचनाएँ लिखने वाले साहित्यकार भी केवल रचनाएँ राजस्थानी भाषा में लिखते हैं, लेकिन बातचीत हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में ही करते हैं। अन्य राज्यों के लोगों को आपसी बातचीत के दौरान अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते हुए अक्सर देखा जा सकता हैं। इसका कारण स्पष्ट है कि उन्हें अपनी मातृभाषा पर कोई शर्मिन्दगी महसुस नहीं होती, इसलिए जहाँ मौका मिलता है, वे लोग अपनी भाषा सहज होकर बोलते हैं।

राजस्थानी भाषाओं के पतन का सबसे बड़ा कारण यहीं है कि राजस्थानी लोग खुद ही अपनी मातृभाषा का सम्मान नहीं करते। राजस्थानी लोगों को अपनी मातृभाषा बोलने में शर्मिन्दगी महसुस होती है। अगर किसी राजस्थानी को कोई दूसरा राजस्थानी मिलता हैं, तब भी वो राजस्थानी में बात करने की बजाय हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू का प्रयोग करना पसन्द करते हैं।

कुछ दिन पहले मैंने यास्मीन खान जी की एक रचना पढ़ी, जिसमें यास्मीन जी ने लिखा हैं कि सब भाषा सीखो, लेकिन अपनी मातृभाषा मत भूलो। यहीं बात मैं राजस्थानियों से कहना चाहूँगा कि हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी ही नहीं, सभी भाषाएं सीखो भी, पढ़ो भी, लिखो भी और बोलो भी, लेकिन अपनी मातृभाषा बोलने में भी झिझक या शर्मिन्दगी नहीं होनी चाहिए।

जब हम खुद ही अपनी मातृभाषा बोलने में शर्मिन्दगी महसूस करेंगे, अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा बोलने से मना करेंगे, तो दूसरों से सम्मान की आस करना तो केवल मूर्खता है। सरकार ने हमारी मातृभाषा को मान्यता नहीं दी, लेकिन सरकार ने ये थोड़े ही कहा है कि राजस्थान के लोग राजस्थानी भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते। स्कूलों में राजस्थानी भाषा नहीं सिखाई जाती, लेकिन घर पर घर के सदस्य तो आपस में राजस्थानी भाषा का प्रयोग कर ही सकते है। जब घर के बड़े राजस्थानी भाषा का प्रयोग करेंगे, तो बच्चे उनको देख-सुनकर अपने आप सीख जाएंगे और जब बच्चे इस माहौल में बड़े होंगे, तो वो भी अपने बच्चों को यहीं सब सिखाएगे।

किसी भी बात के लिए हमें दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। अपनी संस्कृति को, अपनी विरासत को हमें खुद संभालना चाहिए। जब लोगों को जरूरत ही नहीं है, तो सरकार राजस्थानी भाषा को मान्यता क्यों देगी। वहीं माता-पिता खुद स्कूलों से कहे कि हमें हमारे बच्चों को राजस्थानी भाषा भी सीखानी हैं, तो ऐसे अभिभावकों की संख्या अधिक होने पर स्कूल खुद अपने विज्ञापनों में यह कहना शुरू कर देंगे कि हमारे स्कूल में उच्च स्तर के शिक्षकों द्वारा राजस्थानी भाषा भी सिखाई जाती है। जब राजस्थानी जनता का रूझान राजस्थानी भाषा की तरफ़ होगा, तो राजस्थानी भाषा को मान्यता देने के लिए सरकार अपने आप विवश हो जाएँगी। यह भी हो सकता है कि कुछ समय तक ये चुनावी मुद्दा बन जाए और राजनीतिक लोगों के भाषण में हमें सुनने को मिले कि अगर हमारी सरकार बनती हैं, तो हम राजस्थानी भाषा को सरकारी मान्यता देंगे। इसलिए हमारी पार्टी को वोट देकर हमें विजयी बनाए। 

यहाँ कहने का अर्थ यह है कि कोई भी कार्य तभी सम्पन्न होता है, जब जनता को उस कार्य में दिलचस्पी होती हैं। उदाहरण के लिए इस समय देश की जनता को धर्म-मज़हब, दलित-स्वर्ण और नारी-पुरुष जैसे मसलों में दिलचस्पी हैं, इसलिए यहीं सब चुनावी मुद्दे बने हुए है। जब देश की जनता में वास्तविक समस्याओं को समाप्त करने की इच्छा होगी, तो देश के राजनीतिक लोग देश की वास्तविक समस्याओं को समाप्त करना भी शुरू कर देंगे। इसी प्रकार अगर राजस्थान के लोग राजस्थानी भाषा का विकास चाहते हैं, इसके लिए पहल उन्हें खुद करनी होगी। अगर कोई राजस्थानी भाषा बोलने पर आपका मजाक उड़ाता है, तो उसे केवल इतना कहें कि मैं सभी भाषाओं का सम्मान करता हूँ, लेकिन अपनी भाषा भूल ना जाऊँ, इसलिए बोलता रहता हूँ।
..............................#Varman_Garhwal
11-09-2018, #वर्मन_गढ़वाल
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दिल के रिश्ते

पहले हम राजस्थान के हनुमानगढ़ जंक्शन में रहते थे। वहाँ हमारा घर अभी-भी है, जिसमें चिड़ियों के घोंसले मिल जाएँगे। मैं पाँच-सात वर्ष का था, तब की बात है। एक दिन एक घोंसले से चिड़िया का बच्चा नीचे गिर गया। मैंने अपने पापा को बताया, तो उन्होंने बच्चे को वापस घोंसले में रख दिया। जब चिड़िया आई, तो चिड़िया ने बच्चे को फिर से नीचे गिरा दिया। ऐसा तीन-चार बार हुआ, हमने चिड़िया के बच्चे को चिड़िया के घोंसले में रखा और चिड़िया ने हर बार बच्चे को नीचे गिरा दिया। अंत में तीसरी या चौथी बार वो बच्चा नीचे गिरने के बाद मर गया।

मेरी मम्मी ने बताया कि चिड़िया के बच्चे को कोई हाथ लगा दें, तो चिड़िया उसे नहीं अपनाती।

इसके बाद मैंने जानबूझकर अन्य चिड़ियों के बच्चों को हाथ लगाया और हर बार यहीं हुआ। चिड़िया की अनुपस्थिति में चिड़िया के बच्चे को हाथ लगाने पर भी चिड़िया उसे घोंसले से गिरा देती थी।

कुछ समय बाद एक एक घोंसले से एक चिड़िया का बच्चा नीचे गिर गया। चिड़िया के बच्चे को उड़ना नहीं आता था, इसलिए चिड़िया उसे घोंसले में वापस ले जा नहीं सकती थी और अगर हम उसे घोंसले में रखते, तो चिड़िया उसे अपनाएगी नहीं। ये सोचकर मैंने चिड़िया के बच्चे को चावल के दाने, बाजरे के दाने और पानी वगैरह देकर उसके लिए एक अलग जगह बना दी। कुछ दिन बाद चिड़िया बड़ी हो गई और धीरे-धीरे उड़ने लगी, लेकिन वो चिड़िया तोते-कबूतर की तरह ही हमारे पास आकर बैठ जाती थी और ची-ची किया करती थी। उस चिड़िया की अन्य चिड़ियों के साथ बहुत कम बनती थी। उसने अपना घोंसला तो हमारे घर में ही बनाया था, लेकिन अन्य चिड़ियों से दूर, जहाँ हम भी आसानी से उस तक पहुंच सकते थे।

कुछ समय बाद उस चिड़िया ने भी अंडे दिये और समयानुसार अंडों में से बच्चे भी निकले। उसके तीन बच्चे थे। हमने उसके बच्चों को हाथ नहीं लगाया, लेकिन जब उसके बच्चे थोड़े बड़े हुए, तो वो खुद ही अपने बच्चों को हमारे पास ले आती थी। यहाँ खास बात है कि उस चिड़िया और उस चिड़िया के तीनों बच्चों का ऐसा व्यवहार केवल हमारे और हमारे घर आने वाले एक-दो मानव के बच्चों मतलब मेरे साथ खेलने वाले बच्चों में से एक-दो बच्चों के लिए ही था। अन्य मानवों मतलब हमारे आस-पड़ौस के लोगों के लिए उनका व्यवहार अन्य चिड़ियों जैसा ही था। वो चिड़िया और चिड़िया के बच्चे चार-छह महीने तक हमारे घर में घूमते थे, उसके बाद उनका कुछ पता नहीं।

मुझे बचपन में तोते पालने की भी इच्छा थी। मैंने एक के बाद एक चार तोतों के बच्चे खरीदे भी थे, लेकिन वो बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे, इसलिए उनको बिल्ली खा गई।

एक दिन दोपहर के समय दो लड़के हमारी दुकान पर आए। दुकान में मेरे मम्मी-पापा बैठे थे। उन लड़कों के पास एक तोते का बच्चा था, जिसे बेचने के लिए वो पकड़कर लाए थे। मेरी मम्मी ने तोते के बच्चे को देखा, तो उसके पंख कतरे हुए थे। एक पंख टूट चुका था और एक पैर बुरी तरह जख्मी था।

मेरे मम्मी-पापा के पूछने पर पता चला कि वो लड़के बहुत बेरहमी से उस तोते को पकड़कर लाए थे।

उस समय हनुमानगढ़ में बहुत से लोग इसी तरह तोते पकड़कर बेचा करते थे। मेरे मम्मी-पापा ने मेरे लिए 50 रुपये में वो तोते का बच्चा खरीद लिया। वो तोते का बच्चा सारा दिन चुपचाप गुमसुम-सा बैठा रहता था। हम उसे खाने के लिए हरीमिर्च, टमाटर, बिस्कुट वगैरह देते, तो दिन में एक या दो बार ही खाता था। इसके अलावा हम उसके साथ खेलने या बोलने की चाहे कितनी भी कोशिश करें, लेकिन वो मायूस-सा चुपचाप ही रहता था। उसे देखकर ही साफ़ पता चलता था कि वो बहुत उदास है।

हमने उस तोते का नाम मिट्ठू रख दिया था। हमारे घर में एक शहतूत का पेड़ था, दिनभर उस पेड़ पर कई तोते आकर बैठते थे। मिठ्ठू के कारण हमारे घर आने वाले तोतो की संख्या भी बढ़ गई।मिट्ठू हमारे साथ बिल्कुल नहीं बोलता था, लेकिन अन्य तोतो के साथ टें-टें करके बातें करता था। हालांकि उसकी टें-टें में उदासी ही होती थी। कभी-कभी हम उसे शहतूत के पेड़ पर बिठा देते थे, तो वो उड़ने की कोशिश करता था और नीचे आकर गिर जाता। उस समय उसकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी होती थी, जैसे गिरने के बाद किसी अपाहिज इन्सान की होती है। उसके मायूस भाव देखकर लगता था, जैसे वो पूछ रहा है कि आखिर मेरी गलती क्या है ? जैसे हम किसी अपाहिज भिखारी को दयाभाव से देखते हैं, बिल्कुल उसी तरह अन्य तोते भी उसकी ओर दयाभाव से देखते थे।

असल में उस तोते मिठ्ठू के दिल में इन्सानों के लिए नफ़रत थी। क्योंकि इन्सानों ने बिना कारण उसका एक पंख तोड़ दिया, जिसके कारण वो कभी उड़ नहीं सकता था। उसका एक पैर तोड़ दिया, जिसके कारण वो लंगड़ाकर चलता था। अब मैं उस तोते के व्यवहार और उसकी बॉडी लैंग्वेज याद करता हूँ, तो मुझे उसके अन्दर दबी हुई इन्सानों के प्रति नफ़रत का एहसास होता है।

एक रात लगभग साढ़े आठ बजे बहुत तेज आंधी आई। उस आंधी में कई पेड़ टूट गए थे, कई घर टूट गए थे। आंधी शुरू होते ही हम सब एक कमरे में आ गए। मेरे पापा ने पूछा कि मिठ्ठू कहाँ है ? मैंने कहा कि उसका तो पता नहीं।

मेरे पापा आंधी में ही उसे ढूंढने बाहर गए और लगभग एक घंटे तक उसे ढूंढते रहें। तोते को ढूंढने एक जगह दो-तीन बार मेरे पापा गए, लेकिन जब चौथी बार वहाँ गए, तो तोता टें-टें करके बताने लगा कि मैं यहाँ हूँ। तोते के मुँह से पहली बार कोई आवाज़ यहीं सुनी थी। इससे पहले तोते के टय-टय का मतलब कुछ ऐसा होता था, जैसे वो कह रहा हो कि मुझे परेशान मत करो।

मेरे पापा तोता जहाँ फँसा हुआ था, उसे वहाँ से निकालकर कमरे में ले आए और रात के 11 बजे आंधी बन्द होने के बाद हम सब सो गए।

अगली सुबह तोते ने टें-टें करके हम सबको जगाया था और जैसे पहले हम तोते के आगे-पीछे घूमते थे, अब तोता टें-टें करता हुआ हमारे आगे-पीछे घूमने लगा। टमाटर, हरीमिर्च, बिस्कुट, तरबूज, खरबूजा, भिन्डी सारा दिन टें-टें करके अपने लिए खाना भी मांगने लगा और वो भी अपनी पसन्द-नापसन्द के हिसाब से। जब तक उसकी पसन्द का खाना ना दो, तब तक उसकी टें-टें बन्द नहीं होती थी। हमने उसे कुछ भी नहीं सिखाया, लेकिन फिर भी वो दुकान में बैठ जाता था और ग्राहक आने पर टें-टें करके बुलाता था। कोई ग्राहक कुछ चुराने की कोशिश करता, तब भी वो टें-टें करने लगता था। कुल मिलाकर उस आंधी वाली रात के बाद उसके व्यवहार में ऐसा परिवर्तन आया कि उसने हम सबको अपना मान लिया और हम पर अपना अधिकार भी जताता था। इस तरह वो हमारे घर के सदस्य की तरह हो गया।

शहतूत के पेड़ पर अन्य तोतो के साथ बात करने के उसके अंदाज भी बदल गए। अन्य तोते भी पहले की तुलना में कुछ अलग मतलब मिट्ठू को खुश देखकर खुश नज़र आते थे।

कुल मिलाकर अब सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन बिल्ली का खतरा अभी-भी पहले जैसा ही था। ऊपर से मिट्ठू तो उड़ भी नहीं सकता था।

इस बीच बिल्ली ने तीन-चार बच्चे पैदा किये और बच्चों की जगह बदलने की प्रक्रिया में बिल्ली को एक कुत्ती ने मार दिया।

बिल्ली के दो बच्चे जीवित रहें, जिनमें से एक को हमने अपने घर में रख लिया। इस दौरान हमने एक कबूतर भी खरीद लिया। अब हमारे घर एक तोता, एक कबूतर और एक बिल्ली का बच्चा था। इस बीच जिस कुत्ती ने बिल्ली को मारा, वो कुत्ती भी कुछ पिल्ले पैदा करके मर गई। उन पिल्लों में से केवल एक पिल्ला जीवित रहा, जिसे हम अपने घर ले आए।

हमारे घर में तोता, कबूतर, बिल्ली और कुत्ता सब साथ ही रहते थे। इस दौरान दो वाक्ये हुए। एक एक दूसरी बिल्ली हमारे घर आई और तोते की ओर झपटी, जिसे हमारे घर रहने वाली माणु बिल्ली ने बचाया और माणु बिल्ली एक बार घर से बाहर गई, तो एक कुत्ता उसके पीछे पड़ गया। कुत्ता माणु बिल्ली को दबोचने ही वाला था कि हमारे घर रहने वाला कालू कुत्ते ने बीच में आकर माणु बिल्ली को बचा लिया। यहाँ खास बात यह है कि माणु बिल्ली ने जिस बिल्ली से मिठ्ठू तोते को बचाया, वो बिल्ली माणु बिल्ली की माँ की ही संतान थी।

इन चारों को एक-दूसरे से बहुत लगाव हो गया था। इनमें से सबसे पहले माणु बिल्ली की मौत हुई। वो स्वभाव से बहुत नटखट थी। एक दिन हमने ध्यान नहीं दिया और वो घर से बाहर चली गई। एक कुत्ते ने अचानक उसे गर्दन से पकड़कर बुरी तरह जख्मी कर दिया, जिससे वो मर गई।

माणु बिल्ली के मरने के बाद कालू कुत्ता, मिठ्ठू तोता और कबूतर तीनों उदास रहने लगे। कालू कुत्ता अक्सर घर से बाहर जाकर दूसरे कुत्तों से झगड़ता था और इसी कारण एक दिन गली के कुत्तों ने ही उसे मार दिया। मिठ्ठू तोते को कुछ दिन बाद बिल्ली खा गई और कबूतर बीमार होकर मर गया।
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28-10-2018, #वर्मन_गढ़वाल
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Tuesday, October 9, 2018

भारतीय नारी की प्रेम दशा

भारतीय नारी प्रेम पाने के लिए प्रयोग के नाम पर अपनी देह पुरुषों को उपलब्ध करवाने के बाद केवल दिल बहलाने वाले साधारण खिलौने के समान बन जाती है, जिसका अतीत जानकर केवल पुरुष ही फैसला करते हैं, कि इस खिलौने के साथ कुछ समय खेलना है या दूसरों को इसके साथ खेलने से रोकना है ?

भारतीय नारी जब तक प्रेम की चाहत में प्रयोग के नाम पर अपनी देह से पुरुषों का दिल बहलाना नहीं छोड़ेगी, तब तक भारतीय नारी मानसिक रूप से पुरुषों की गुलाम ही रहेंगी और गुलाम के साथ कैसा व्यवहार होता है ? यह गुलाम के मालिकों पर निर्भर करता है। गुलाम केवल अपने मालिक बदल सकते हैं, लेकिन रहते वो गुलाम ही है। इसी तरह भारतीय नारी बुरा व्यवहार या अपमान होने पर केवल पुरुष बदल सकती है, लेकिन रहती वो पुरुष की गुलाम ही है। बुरा पुरुष बुरे मालिक की तरह बुरा व्यवहार करता है और अच्छा पुरुष अच्छे मालिक की तरह अच्छा व्यवहार करता है।

भारतीय नारी यदि इस मानसिक गुलामी से मुक्ति पाकर सम्मान पाना चाहती है, तो सबसे पहले इस मानसिकता को समझना होगा कि पुरुष स्वयं चाहे कैसा भी हो, लेकिन पुरुष को पत्नी पवित्र चाहिए। सरल शब्दों में कहें, तो वर्जन लड़की अर्थात शुद्ध कुँवारी कन्या। कुछ पुरुष पहले से शारीरिक संबंध बना चुकी नारी को सहजता से स्वीकार करते हैं, लेकिन उन पुरुषों की मानसिकता यहीं होती है, कि उन्होंने ऐसी नारी के साथ सम्मानित रिश्ता जोड़कर नारी का जीवन सँवारकर नारी पर एहसान किया है। भारतीय पुरुषों की यह मानसिकता बदलें बिना भारतीय पुरुषों से नारी-सम्मान की आशा करना गलतफ़हमी पालने जैसा है।

अगर भारतीय नारी अपनी देह प्रस्तुत करने से पहले पुरुषों के सामने उनकी पवित्रता की शर्त रखना शुरू कर दें, तो भारतीय नारी को प्रेम पाने के लिए अपनी देह प्रस्तुत करने की आवश्यकता ही नहीं रहेंगी। और जब प्रेम मिलता है, तो सम्मान अपनेआप मिल जाता है। क्योंकि देह की चाहत रखने वाले देह पाने के लिए केवल प्रेम का सहारा लेते हैं, वास्तव में उन्हें प्रेम होता नहीं है। इसलिए देह पाने के बाद वो बदल जाते हैं। लेकिन जिन्हें प्रेम होता है, उनके लिए आपका सम्मान ही सर्वोपरि होता है।

हम अक्सर लड़कियों और महिलाओं से सुनते हैं कि लड़के सिर्फ जिस्म की खूबसूरती से प्यार करते हैं, पुरुष केवल शारीरिक सुन्दरता से प्रेम करते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लड़के और पुरुष ये अच्छी तरह जानते हैं कि नारी प्रेम पाने के लिए आसानी से अपना शरीर उपलब्ध करवा देती है।

भारतीय नारी द्वारा किसी पुरुष को अपनी देह केवल तभी उपलब्ध करवानी चाहिए, जब उस पुरुष से शारीरिक सुख पाने की इच्छा हो और वो भी अपनी शर्तों पर उपलब्ध करवानी चाहिए। इससे पुरुष केवल तभी नारी को प्रेम देंगे, जब उनके मन में नारी के लिए प्रेम होगा। अगर उनके मन में शारीरिक सुख पाने की इच्छा होगी, तो प्रेम का दिखावा किये बिना सीधे शारीरिक संबंध बनाने की बात करेंगे। क्योंकि जब नारी प्रेम के लिए शरीर उपलब्ध नहीं करवाएगी, तो नारी का शरीर पाने के लिए प्रेम करने का कोई औचित्य ही नहीं रहेगा और शारीरिक सुख के लिए प्रेम के नाम पर होने वाली धोखेबाजी समाप्त हो जाएँगी।

प्राचीन समय में नारी पुरुषों के अधीन थी, इसलिए नारी को पुरुषों द्वारा बनाए रीति-रिवाज और मान-मर्यादा के नियम-कायदों के अनुसार ही चलना पड़ता था। दुनिया के सभी धर्म-मज़हब, साहित्य, संविधान और कानून में नारी के लिए अभी तक जो भी लिखा, पढ़ा, बताया और समझाया गया है, वो सब समय और परिस्थिति के अनुसार पुरुषों द्वारा ही लिखा, पढ़ा, बताया और समझाया गया है। जो थोड़ा-बहुत महिलाओं ने लिखा, पढ़ा, बताया और समझाया है, वो सब भी पुरुषों से प्रभावित होकर ही लिखा, पढ़ा, बताया और समझाया है।

यहाँ कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि प्राचीन समय में सब गलत ही था। प्राचीन समय की कुछ बातें समय और परिस्थिति के अनुसार बदलनी चाहिए। कुछ बातें स्वार्थी और चालाक पुरुषों द्वारा मनमाने तरीके से बदलने के कारण मानने योग्य नहीं है। पहले नारी को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं थी, इसलिए पुरुषों द्वारा मान-मर्यादा और तहज़ीब के नाम पर अपने मनमाने विचार नारी पर थोप दिये जाते थे। लेकिन अब समय बदल चुका है। अब नारी अपने विचारों के अनुसार जीवन जीने के लिए स्वतंत्र है।

अतः जिस प्रकार पुरुषों ने नारियों के लिए पवित्रता के मापदंड बना रखे हैं और उन्हीं के आधार पर नारी का चयन करते हैं। उसी प्रकार नारियों को भी पुरुषों के लिए पवित्रता के मापदंड बनाने चाहिए और उन्हीं पवित्रता के मापदंडों के आधार पर पुरुष का चयन करना चाहिए।

प्राचीन समय में नारी द्वारा पुरुषों की पवित्रता के मापदंड तय करना संभव नहीं था, लेकिन अब यह संभव है। फिर भी भारतीय नारी इसका लाभ उठाने की बजाय कपड़े, सिगरेट-शराब और सिन्दूर-बिंदी में उलझी हुई है। ये व्यर्थ की बातें छोड़कर आधुनिक भारत की शिक्षित और सक्षम नारियों को विशेषकर युवा लड़कियों को इस स्वतंत्रता का लाभ उठाकर अपनी बुद्धि और अपने विवेक का प्रयोग करके सोच-समझकर सही-गलत और अच्छे-बुरे पर विचार करके अपनी स्वयं की विचारधारा बनानी चाहिए।
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09-10-2018, #वर्मन_गढ़वाल
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